यदि कोई युवती यह सोच कर किसी व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाती है कि वह उससे विवाह करेगा तो यह कृत्य रेप की श्रेणी में नहीं आएगा। विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने पर ही पुरुष के खिलाफ मामला बनता है।
अदालत का कहना है कि पुरुष व महिला के बीच दोस्ती में बने शारीरिक संबंध भी रेप नहीं है। साकेत अदालत स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश विरेंद्र भट्ट ने गाजियाबाद निवासी युवक को बरी करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती व उसकी मां के बयानों में विरोधाभास है। युवती ने कहा कि उसके साथ आरोपी ने 21 फरवरी 13 को घर में जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
मां बोली युवती जब घर आई तो खुश थी
वहीं उसकी मां का बयान है कि युवती जब घर आई तो खुश थी, जबकि यदि उससे जबरदस्ती की होती तो वह नाराज होती। इसी प्रकार मां-बेटी के बयानों से स्पष्ट है कि करीब डेढ़ वर्ष तक युवती ने अपने परिवार को आरोपी के बारे में नहीं बताया।
वहीं जब आरोपी उनके घर गया तो भी विवाह के संबंध में कोई बात नहीं हुई। अदालत ने युवती के उस तर्क को भी खारिज किया कि आरोपी ने उससे दोनों के नाम पर घर खरीदने के लिए चार लाख रुपये लिए जिसे वह अपनी चचेरी बहन से लेकर आई।
अदालत ने कहा कि बहन घरेलू महिला है और उसकी अपनी कोई आय नहीं है। ऐसे में पहली ही मुलाकात में इतनी बड़ी राशि वह कैसे व कहां से दे सकती है।
उनके बीच दोस्ती में ही शारीरिक संबंध बने
इतना ही नहीं उसने इस संबंध में अपने पति तक को नहीं बताया। स्पष्ट है कि यह कहानी बनाई गई है। इसके अलावा अन्य साक्ष्यों से भी साफ है कि युवती की आरोपी से दोस्ती थी और उनके बीच दोस्ती में ही शारीरिक संबंध बने।
अदालत ने कहा ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है कि आरोपी ने कभी भी विवाह की बात की हो। युवती ने आरोप लगाया था कि दोनों की वैवाहिक साइट के जरिए मुलाकात हुई थी।
बाद में आरोपी की बहन व मां ने एक शोरूम खोलने के लिए एक करोड़ की मांग की जिसका आरोपी ने समर्थन किया। मना करने पर आरोपी ने विवाह से इनकार कर दिया।