- कानूनी दस्तावेजों की वेबसाइट में हाईकोर्ट में कहा एकल पीठ के आदेश से हो रही परेशानी
- एकल पीठ में जून में भुला दिए जाने का अधिकार दिया था जिसके बाद 80 फैसलों को वेबसाइट से हटाया जा चुका है
- आदेश को नजीर के तौर पर इस्तेमाल कर वेबसाइट पर पड़ रहा दबाव
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
कानूनी दस्तावेजों की लोकप्रिय वेबसाइट इंडियन कानून ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि भूलने के अधिकार (राइट टू बी फॉरगॉटन) संबंधी एक फैसले के कारण उसे गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की खंडपीठ ने इस अपील को 13 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। सुनवाई में इंडियन कानून के वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि एकल न्यायाधीश के जून के आदेश के बाद उन्होंने पहले ही 80 फैसलों को हटा दिया है। यह आदेश अब मिसाल के तौर पर इस्तेमाल हाे रहा है, जिससे प्लेटफॉर्म को और अधिक परेशानी हो रही है।
एकल न्यायाधीश ने एक व्यक्ति के अनुरोध पर ‘भुला दिए जाने का अधिकार’ मानते हुए निर्देश दिया था कि कुछ फैसलों और आदेशों में नाम आधारित खोज सुविधा को अक्षम किया जाए तथा उन्हें डिस-इंडेक्स किया जाए, जहां सूचना अब प्रासंगिक नहीं रह गई या किसी वैध सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती। इंडियन कानून ने इस फैसले के खिलाफ अपील में तर्क दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के पुट्टस्वामी फैसले में ‘भूलने के अधिकार’ संबंधी टिप्पणियां ओबिटर डिक्टा थीं और उनसे कोई लागू करने योग्य अधिकार नहीं बनता।
केवल एक ही वेबसाइट को लक्षित करने पर जताया ऐतराज
उन्होंने कहा कि ‘प्रासंगिकता’ और ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ का मापदंड अस्पष्ट है तथा यह आदेश खुले न्याय के सिद्धांत और सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(ए)) के साथ उचित संतुलन नहीं बैठाता। वेबसाइट ने यह भी आरोप लगाया कि आदेश केवल उसे लक्षित करता है, जबकि एससीसी ऑनलाइन जैसी अन्य कानूनी वेबसाइटों को इसमें शामिल नहीं किया। नाम आधारित खोज कानूनी डेटाबेस के लिए आवश्यक है और यह अदालतों की वेबसाइटों पर पार्टी नाम से खोज के समान है।