एक तरफ सरकार शिक्षा में सुधार के दावे कर रही है। वहीं, शिक्षा की गुणवत्ता सुधरने की जगह बिगड़ती जा रही है। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के सरकारी दावों की पोल राजकीय पाठशालाओं में खुल रही है।
प्रशासन और शिक्षा विभाग की तमाम योजनाएं यहां कागजों में सिमटी नजर आती हैं। जिले में 280 पाठशालाएं है, जिनमें अधिकतर महज 100 से 150 गज के प्लॉट में चल रही हैं।
सच कहा जाए तो आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। संवाददाता पूजा शर्मा ने प्राथमिक पाठशालाओं की हकीकत जानने की कोशिश की।
बरामदे में लगती हैं कक्षाएं
राहुल कॉलोनी की प्राथमिक पाठशाला का नजारा चौंकाने वाला था। स्कूल के एक जर्जर से कमरे में बच्चे ठसाठस भरे हुए थे।
हैरान कर देने वाली बात तो यह थी कि यहां तीसरी और पांचवीं की कक्षाएं एक ही कमरे में लग रही थीं। इसी स्कूल के दूसरे कमरे में चौथी कक्षा के विद्यार्थी दूसरी कक्षा के बच्चों के साथ पढ़ते दिखे।
जबकि तीसरे कमरे में स्टाफ रूम बना हुआ था। पहली कक्षा के बच्चों को कमरा नसीब नहीं हुआ तो बरामदे में ही इनको सेट कर दिया गया।
एक कमरे में तीन क्लासें
नेहरू कॉलोनी के प्राथमिक स्कूल का हाल और भी बेहाल दिखा। स्कूल के अंदर और बाहर चारों तरफ से गंदगी के ढेर लगे थे। 100 गज जमीन पर बने इस स्कूल में पांचवीं कक्षा तक के बच्चे पढ़ रहे हैं।
स्कूल के दयनीय हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां एक कमरे में ही तीन क्लासें लगाई जा रही थीं। पढ़ाने के लिए महज दो गेस्ट टीचर स्कूल में मौजूद थे।
ये कैसा स्वच्छ भारत अभियान-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की हकीकत जाननी हो तो शहर के प्राथमिक स्कूलों का हाल देख लीजिए। किसी स्कूल में शौचालय नहीं है तो किसी स्कूल के शौचालय का दरवाजा टूटा हुआ है।
तालाब बना शिक्षा का मंदिर
वहीं, कुछ स्कूलों के शौचालयों पर ताला जड़ा दिखेगा। नेहरू कॉलोनी के प्राथमिक स्कूल में खुले में शौच जा रहे बच्चे स्वच्छ भारत अभियान की हवा निकालते दिखे।
आदर्श कॉलोनी का स्कूल पूरी तरह से जलमग्न दिखाई दिया। कॉलोनी में घुटनों तक पानी जमा था। बच्चों को दो कमरों में ठूंस-ठूंस बिठा रखा था। स्कूल का दरवाजा बाहर से बंद था, ताकि कोई बच्चा बाहर जलभराव का शिकार न बन जाए।
पानी न कर दे बीमार-
एक तरफ स्वास्थ्य मंत्री पानी की टंकियों पर कड़ी निगरानी का दावा कर रहे हैं। वहीं, प्राथमिक स्कूलों में सीमेंटेड टंकियों से बच्चों को पानी पिलाया जा रहा है। इनकी सफाई कब की गई होगी, इसका अंदाजा स्कूल प्रबंधन को भी नहीं था।
अस्त-व्यस्त हैं व्यवस्थाएं
खेल को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार तमाम गतिविधियां चलाने का दावा कर रही है, लेकिन प्राथमिक स्कूलों का हाल देखकर सरकारी दावों की हकीकत अपने आप बयां हो जाती है।
वैसे तो इन स्कूलों में बच्चों के खेलने के लिए मैदान तक भी नहीं है, लेकिन जिन स्कूलों में छोटे मैदान हैं, उनमें टूटे हुए झूले हादसों को न्योता दे रहे हैं।
मुख्य संसदीय शिक्षा सचिव सीमा त्रिखा के मुताबिक सरकार की जितनी भी योजना है, उन्हें लागू किया जाएगा। प्राथमिक स्कूलों को सुधारने के लिए समाज सेवियों को आगे आना होगा। सरकार से बजट लेकर सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
पाठशाला के लिए ये हैं मानक
जिला शिक्षा अधिकारी रामकुमार फलसवाल ने कहा कि उन्होंने कई बार प्राथमिक स्कूलों का दौरा किया है। वाकई हालात दयनीय हैं। इस बारे में कई बार शिक्षा निदेशालय को लिखा जा चुका है। वहां से कोई आदेश आने पर ही सुधार का काम किया जाएगा।
पाठशाला के लिए ये हैं मानक
-पाठशाला कम से कम 750 वर्ग मीटर जमीन पर बनी हो।
-शौचालय, पानी की टंकी, खेल का मैदान और झूले अनिवार्य।
- हर कक्षा के लिए अलग से कमरा होना अनिवार्य।
-30 बच्चों पर एक अध्यापक की नियुक्ति भी जरूरी।