फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

RTI से खुलासाः चार साल में 38 फीसदी घटा चावल भंडारण, नोटबंदी से और बिगड़ेंगे हालात

Thu, 24 Nov 2016 01:38 PM IST
अमित कुमार निरंजन/अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
भंडारण - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
इस बार मानसून भले ही बेहतर रहा हो लेकिन नोटबंदी के चलते किसानों को रबी की बुआई का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि केंद्र ने पुराने नोटों से नाबार्ड और सरकारी बीज भंडारण इकाइयों से बीज खरीद की घोषणा की है लेकिन सरकार को धान भंडारण की यह खबर चिंता में डाल सकती है। देश में धान भंडारण लगातार कम होता जा रहा है। आरटीआई के मुताबिक चावल का भंडारण पिछले चार सालों में अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है।
विज्ञापन


अमर उजाला को आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार चावल के भंडारण में 38 फीसदी की कमी आई है। भारतीय खाद्य निगम योजना एवं अनुसंधान अनुभाग मुख्यालय ने आरटीआई के माध्यम से पिछले चार साल का चावल और गेहूं के भंडारण का ब्यौरा दिया।

अगस्त 2016 को दिए जवाब में विभाग ने बताया है कि गेहूं के भंडारण में तेजी आई है लेकिन चावल के भंडारण में लगातार गिरावट आई है। पिछले चार सालों में गेहूं का भंडारण करीब 10 फीसदी तक बढ़ा है।
विज्ञापन


आरटीआई के मुताबिक अगस्त 2016 में गेहूं और चावल का कुल भंडारण 490 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) था। जिसमें गेहूं का भंडारण 269 एलएमटी और चावल का भंडारण 221 एलएमटी था। जबकि वर्ष 2013 में गेहूं का भंडारण 242 एलएमटी और चावल का भंडारण 355 एलएमटी था। इस वर्ष दोनों का भंडारण 597 एलएमटी था जो पिछले चार साल में सबसे अधिक था।

हालांकि इसके बाद के वर्षों में चावल के भंडारण में लगातार गिरावट आई।  अप्रैल 2014 में  306 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी), 2015 में 238 एलएमटी चावल का भंडारण था। जबकि वर्ष 2016 में 1 अप्रैल तक चावल का भंडारण 288 एलएमटी था लेकिन 1 अगस्त तक इसका भंडारण घटकर 221 एलएमटी रह गया।

गेहूं के मामले में थोड़ी राहत की बात है। तीन साल लगातार गिरने के बाद अब इसका भंडारण बढ़ गया है। 2014 में 178 एलएमटी, 2015 में 172 एलएमटी, 1अप्रैल 2016 को 145 एलएमटी गेहूं का भंडारण था। जबकि 1 अगस्त तक गेहूं का भंडारण 269 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) तक पहुंच गया। पिछले चार सालों में चावल और गेहूं का सबसे कम भंडारण कुल 410 एलएमटी 1 अप्रैल 2015 में था। गौरतलब है कि पुराने नोट न चलने से किसानों को रबी की बुआई के लिए बीज, खाद जैसे जरूरी संसाधनों की खरीद के लिए दिक्कत आ रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें