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सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं रोजा, यह सिखाता है सब्र और बंदों से मोहब्बत करना 

Sun, 19 Jun 2016 12:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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जुमे की नमाज अदा करते लोग - फोटो : फाइल फोटो
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रमजान का पाक महीना रोजे और इबादतों के लिए ही नहीं, बल्कि इसलिए भी खास है कि इस माह में ही पवित्र कुरान मुकम्मल (पूर्ण) हुआ। जामा मस्जिद ऊंचागांव के इमाम मौलाना जमाल उद्दीन ने कहा कि रमजान में कुरान पाक की तिलावत (पाठ) करना बेहतरीन इबादत है, लेकिन साथ ही इसे समझना और उसके बताए रास्तों पर अमल करना अफजल है।  
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सेहरी को सुन्नत बताते हुए कहा उन्होंने कहा कि यह अल्लाह की ओर से बरकत है. सेहरी के लिए उठने पर फज्र की नमाज के लिए तैयार होने में आसानी होती है। 

उन्होंने कहा कि रोजा तकवा (हराम कामों से दूरी) पैदा करने वाला होता है। रोजा की हालत में इंसान अपने जज्बात और  ख्वाहिशों पर काबू करना सीखता है। 

रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है। रोजा आंख, जुबान, कान और दिमाग का भी होता है। रोजे की हालत में आंख को बुरी चीजें नहीं देखनी चाहिए, जुबान से गलत या झूठ बात नहीं निकालनी चाहिए, कानों को गीत संगीत और विलासिता वाली बातों से बचना चाहिए। 

फितूर से दूर दिमाग को अल्लाह की खुशी और उसकी रजा के लिए इबादत में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि तकवा अपनाने से इंसान इन सब बुराइयों से दूर रहता है और अल्लाह की खुशी हासिल करता है। 
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