छह साल पहले तत्कालीन सरकार की बस खरीद योजना पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री ने बस खरीद मामले की जांच कराने का बयान देकर परिवहन निगम में हलचल पैदा कर दी है।
फरीदाबाद डिपो में 150 लो फ्लोर बसों में से अधिकांश जर्जर हो चुकी हैं, जबकि करीब छह साल पहले ही इनकी खरीद हुई थी। रोडवेज सूत्रों की मानें तो तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में हुई बस खरीद का रिकॉर्ड खंगालने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
माना जा रहा है कि जांच में यदि खरीद के दौरान गड़बड़ी पाई गई तो कई अधिकारी व राजनेता फंस सकते हैं। परिवहन मंत्री के जांच कराए जाने के बयान का हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन ने भी समर्थन किया है।
दरअसल, 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान केंद्र सरकार ने देश के अलग-अलग राज्यों को जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) के अंतर्गत लो-फ्लोर बसें मुहैया कराई थीं।
इस दौरान फरीदाबाद नगर निगम को भी 150 बसें दी गईं, जिनके संचालन का जिम्मा हरियाणा रोडवेज को दिया गया। इन बसों की खरीद में केंद्र सरकार ने 80 प्रतिशत और राज्य सरकार ने 20 प्रतिशत राशि दी थी।
150 बसों में अशोक लीलैंड कंपनी की 85 लो-फ्लोर(नॉन एसी) बसें, 30 लो-फ्लोर(एसी) बसें, 15 वोल्वो और 20 स्वराज मिनी बसें शामिल थीं। जिनकी कीमत करीब 53 करोड़ आंकी जा रही है।
कॉमनवेल्थ की आपाधापी में खरीदी गई बसों को बिना संचालन की प्लानिंग के ही खरीदने की बात सामने आ रही है। क्योंकि जब बसें खरीदी गई तब न रोडवेज के पास पर्याप्त ड्राइवर थे और न ही कंडक्टर। जिसके चलते दो साल तक बसें डिपो में खड़ी खड़ी जर्जर हो गई। 53 करोड़ की इस योजना का जो लाभ जनता को मिलना चाहिए था वो नहीं मिल सका।