अदालत ने कहा है कि पीछा करना एक ऐसा खतरा बन गया है, जिसके चलते महिलाएं अकेली बाहर जाने में खुद को असुरक्षित और घबराया हुआ तो महसूस करती ही हैं। यह उनके जीने और आजादी के अधिकार का भी उल्लंघन करता है।
मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सुशील बाला डागर ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति को पीछा करने का दोषी करार देते हुए की। अदालत ने आरोपी को ट्रायल के दौरान सात माह 25 दिन जेल में काटी गई सजा को ही सजा मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने सजा सुनाते हुए कहा कि आरोपी को वास्तव में पछतावा है।
अदालत ने कहा कि पीछा करना एक सामाजिक अपराध है, जो महानगरों में महिलाओं के जीने और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। भारतीय महिलाओं की एक बड़ी संख्या ऐसी है, जिसने इसका सामना किया है या इस बुराई का सामना कर रही हैं।
सार्वजनिक यातायात व्यवस्था हो या सार्वजनिक स्थान, शॉपिंग मॉल हो या मल्टीप्लेक्स महिलाएं हर जगह खुद को पीछा किए जाने के खतरे के प्रति असहाय महसूस करती हैं।
आरोपी महिला का पीछा करता था
कोर्ट
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अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए मेरा मानना है कि दोषी को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 डी, 341, 509 के तहत उस अवधि की साधारण कैद दी जाए, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार अशोक विहार निवासी आरोपी ने 12 दिसंबर 2013 को एक महिला का पीछा किया था। आरोपी ने शराब के नशे में उसे रोका और अपशब्द कहे। वह शिकायतकर्ता को लगातार फोन कर मिलने के लिए कहता रहता था।
बचाव पक्ष के वकील ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि महिला आरोपी की मां की उम्र की है। मेरे मुवक्किल को इसलिए फंसाया गया, क्योंकि वह शिकायतकर्ता की बेटी का परिचित था। अदालत ने शिकायतकर्ता के बयान को विश्वास योग्य बताया और कहा कि मामले के तथ्यों तथा परिस्थितियों को देखते हुए यह बयान त्रुटि रहित रहा है। इस आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी करार दिया।