नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को एक साल तक शांति भंग न करने की शर्त पर रिहाई के मामले में कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा है कि संविधान प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन राजधानी में आम लोगों की जिंदगी और स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। हालांकि, शर्तों में ऐसे शब्द न इस्तेमाल हों जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता हो। विशेषज्ञों का साझा मत है कि सीजेपी नेताओं की रिहाई सकारात्मक कदम है, लेकिन भविष्य में किसी भी राजनीतिक दल या संगठन को प्रदर्शन के दौरान हिंसा या अराजकता फैलाने से बचना चाहिए।
नई दिल्ली बार एसोसिएशन के सचिव अधिवक्ता तरुण राणा ने कहा कि तीनों नेताओं को स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था जो एक एसीपी रैंक का पुलिस अधिकारी होता है। उसे बीएनएस पूर्व में सीआरपीसी के तहत अधिकृत है कि निवारक हिरासत के बाद समयबद्ध शर्त लगा सके लेकिन यह शर्त ब्लैंकेट बैन नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है। कोई भी सरकार या पुलिस इसे पूरी तरह रोक नहीं सकती। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। जब प्रदर्शन राजधानी के सामान्य जनजीवन, यातायात और आम नागरिकों की स्वतंत्रता को बाधित करने लगे, तो पुलिस कानूनी सीमाओं के अंदर कार्रवाई कर सकती है।
एक अन्य विशेषज्ञ अधिवक्ता रवि दराल ने निवारक गिरफ्तारी और शर्तों वाली रिहाई पर टिप्पणी करते हुए कहा, निवारक हिरासत का इस्तेमाल सावधानी से होना चाहिए। एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त कानूनी रूप से वैध हो सकती है, लेकिन प्रदर्शन के बीच ऐसी बाधक शर्त लगाने से बचना चाहिए। यह लोकतांत्रिक तौर पर गलत है। ऐसी शर्तों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता जूही अरोड़ा का कहना है कि जंतर मंतर जैसे निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि आम लोगों की दिनचर्या प्रभावित न हो। उन्होंने कहा, प्रदर्शन का अधिकार और नागरिकों की लाइफ एंड लिबर्टी दोनों को संतुलित रखना अदालतों और प्रशासन की जिम्मेदारी है। राजधानी होने के नाते दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रहती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोकतांत्रिक अधिकारों को पूरी तरह कुचला जाए।