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मानसिक मरीजों के आंकलन के लिए रिव्यू बोर्ड नहीं बनाने पर फटकार

Mon, 29 Jul 2019 05:24 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : डेमो
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अदालत ने स्टेट मेंटल हेल्थ सर्विसेज अथोरिटी को फटकार लगाते हुए पूछा है कि संबंधित कानून में अनिवार्य होने के बाद भी अब तक मानसिक रोगियों के आंकलन के लिए रिव्यू बोर्ड क्यों नहीं बनाया गया है। यह सवाल अदालत ने एक एनजीओ की अर्जी पर सुनवाई करते हुए पूछा है। 

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एनजीओ ने उसके आश्रय गृह में रह रही एक महिला की मानसिक स्थिति के आंकलन का आदेश देने के लिए अर्जी दायर की है। यह महिला एमबीबीएस है और उसने कोर्ट के आदेश पर या फिर वकील की मौजूदगी में ही अपनी जांच कराने की मांग की है। 

तीस हजारी अदालत के महानगर दंडाधिकारी अभिलाष मल्होत्रा ने स्टेट मेंटल हेल्थ सर्विसेज अथोरिटी को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने और यह बताने के लिए कहा है कि अब तक रिव्यू बोर्ड क्यों नहीं बनाया गया है। 
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साथ ही, दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को आदेश दिया है कि वह महिला को सरकारी वकील मुहैया कराए और उसके मामले को अथोरिटी के समक्ष रखे, ताकि जांच के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया जा सके। 

एनजीओ इक्विटी स्ट्डीज ने अर्जी दायर कर महिला की मानसिक जांच व उसे फौरन अस्पताल में भर्ती कराने का आदेश देने का आग्रह अदालत से किया है। यह महिला एनजीओ के शेल्टर होम में अगस्त 2018 से रह रही है। यह महिला खुद को डॉक्टर बताती है और राजधानी में 1989 से रह रही है। वह दिसंबर 2017 में किसी अन्य एनजीओ के शेल्टर होम में रह रही थी। 

जब वह इक्विटी स्ट्डीज में आई तो उसकी मानसिक जांच कराने के लिए कहा गया, लेकिन उसने इससे इंकार करते हुए कहा वह कोर्ट के आदेश पर व वकील की मौजूदगी में जांच कराएगी।

एनजीओ ने अदालत से महिला को फौरन अस्पताल में भर्ती करने के लिए मानव व्यवहार एवं संबद्घ विज्ञान संस्थान (इहबास) को एंबुलेंस भेजने का निर्देश देने की मांग की। इहबास ने कोर्ट को बताया कि उस महिला ने जांच में सहयोग करने से इंकार कर दिया था। अथोरिटी ने कोर्ट को बताया कि बिना मानसिक जांच किए किसी मरीज को अस्पताल में भर्ती करना व्यवहारिक नहीं है। 

अदालत ने इन हालात पर कहा कि किसी मरीज को बिना उसकी सहमति के अस्पताल में भर्ती कराने का अधिकार केवल डिस्ट्रिक्ट मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड के पास है और इस कोर्ट के पास यह आदेश देना का अधिकार नहीं है। कानूनन बाध्यता होने के बाद भी अथोरिटी ने जिला रिव्यू बोर्ड नहीं बनाए हैं।

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