कैबिनेट ने रियल एस्टेट नियामक और विकास बिल, 2015 को मंजूरी दे दी है। नए बिल के एक अहम प्रावधान के मुताबिक अब रियल एस्टेट डेवलपर्स को परियोजना लागत की 70 फीसदी रकम अलग अकाउंट (एस्क्रो अकाउंट) में जमा रखनी होगी।
कांग्रेस और माकपा ने खास तौर पर इस प्रावधान को प्रस्तावित बिल में शामिल करने की मांग की है। मकान की खरीदारी के दौरान उपभोक्ताओं के आर्थिक हितों का ख्याल रखने के साथ डेवलपर्स के प्रति उनमें विश्वास कायम करने के लिए रियल एस्टेट बिल, 2015 पर राज्य सभा की प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) की रिपोर्ट को बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ने अपनी मंजूरी दे दी।
अब इस बिल को संसद के समक्ष पेश किया जाएगा। रियल एस्टेट के आवासीय व व्यावसायिक दोनों ही प्रकार की परियोजनाएं इस बिल के दायरे में आएंगी। माना जा रहा है कि बिल से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा तो होगी ही रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश भी बढ़ेगा।
हर परियोजना के लिए अलग अकाउंट
बिल के मुताबिक डेवलपर्स पर नियंत्रण के लिए रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी और सभी रियल एस्टेट एजेंट व सभी रियल एस्टेट परियोजनाओं को प्राधिकरण में पंजीकृत होना पड़ेगा।
डेवलपर्स को अपनी परियोजना के बारे में प्राधिकरण के समक्ष हर प्रकार खुलासा करना पड़ेगा। इनमें लेआउट प्लान, वित्तीय व्यवस्था, जमीन की स्थिति, अपने एजेंट्स, ठेकेदार, स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स जैसी जानकारियां शामिल हैं।
हर परियोजना के लिए डेवलपर्स को अलग बैंक खाते में राशि जमा करनी होगी ताकि उस परियोजना का काम समय पर पूरा हो सके। डेवलपर्स व खरीदार के बीच होने वाले विवाद के निपटान के लिए अलग से अपीलीय ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाएगी।
बिल के मुताबिक इससे जुड़े विवाद को निपटाने का अधिकार सिविल कोर्ट के पास नहीं होगा। हालांकि इन मामलों की सुनवाई उपभोक्ता अदालत में की जा सकती है।
डेवलपर और उपभोक्ता दोनों के लिए खतरनाक है एक सेक्शन
कनफेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) के प्रेसिडेंट गीतांबर आनंद ने रियल एस्टेट बिल को कारोबार बढ़ाने वाला बिल बताया।
उन्होंने कहा कि हम इस बिल के समर्थन में है, लेकिन इसके सेक्शन-3 में ऐसे प्रावधान किए गए हैं कि परियोजना के 80 फीसदी पूरा होने के बाद भी नियामक किसी भी नियम का उल्लंघन बताकर पूरी परियोजना को रद्द कर सकता है।
डेवलपर्स और उपभोक्ता दोनों के हक में सेक्शन 3 के प्रावधान को हटाया जाना चाहिए। वहीं गौड़संस के प्रबंध निदेशक मनोज गौड़ ने बताया कि हम नियामक के समर्थन में है, लेकिन परियोजना पूरी होने के बाद हमें फिर से उनके पास अकुपेशनल सर्टिफिकेट (ओसी) लेने जाना पड़ेगा और उस समय नियामक चाहे तो उसमें आसानी से अड़ंगा लगा सकता है।
इस प्रावधान को भी हटाया जाना चाहिए। क्रेडाई के वाइस प्रेसिडेंट व आशियाना होम के निदेशक रोहित राज मोदी ने बताया कि यह बिल को पिछले समय से लागू किया जाएगा। यानी कि जो भी निर्माणाधीन परियोजनाएं हैं, सभी इनके दायरे में आ जाएंगी जो उचित नहीं है।