दिल्ली विधानसभा की पब्लिक अकाउंट कमेटी ने आठ साल पहले दिल्ली सरकार के एक फैसले का सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की थी। पीएसी के अनुसार स्मार्ट कार्ड ऑप्टिकल होने की बजाय चिप वाले होने चाहिए थे।
क्योंकि ऑप्टिकल कार्ड बहुत महंगे थे। लेकिन परिवहन विभाग ऑप्टिकल कार्ड ही बनाता रहा। तब से अब तक लोगों से 118 करोड़ रुपये अधिक वसूल किए गए।
महंगी आरसी बनाने के फैसले पर 2006 में ही पीएसी ने सवालिया निशान लगाया था। तब से अब तक इस मामले को केंद्र में रखकर कोई आधिकारिक जांच तो नहीं हुई लेकिन अब आरसी सस्ती करने के फैसले से जाहिर है कि पहले का फैसला गलत था। सीएजी ने अपनी जांच में भी इस ओर इशारा किया था।
अपनों ने ही साधा निशाना
आरसी मामले में तब हुए घोटाले की जांच पीएसी को सौंप दी गई थी। आमतौर पर पीएसी के अध्यक्ष विपक्ष के नेता हुआ करते हैं। लेकिन तब विपक्ष से रिश्ते ठीक न होने के कारण इसके अध्यक्ष कांग्रेस विधायक एससी वत्स को बनाया गया।
हालांकि इसके बावजूद उन्होंने जो रिपोर्ट दी उसमें यह बाताया गया था कि स्मार्ट कार्ड के फैसले में जबर्दस्त अनियमितताएं बरती गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया था कि इस मामले में दलाली भी खाई गई है और उस दलाल का नाम सामने आना चाहिए। इतनी गंभीर सिफारिशों के बावजूद शीला दीक्षित सरकार ने यह फैसला लागू किया, इसकी जांच नहीं कराई और रिपोर्ट को अहमियत भी नहीं दी।
रिपोर्ट देने के बाद ले लिया था संन्यास
एससी वत्स ने यह रिपोर्ट देने के बाद राजनीतिक संन्यास ले लिया था। तब उन्होंने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में कहा था कि एपेक्स कमिटी ने माइक्रोप्रोसेसर वाले चिप की सिफारिश की थी, लेकिन ट्रांसपोर्ट विभाग ने उसे बदल दिया।
विभाग ने ऑप्टिकल मीडियम के कार्ड का फैसला किया, जबकि तब तक ऑप्टिकल कार्ड को टेस्ट भी नहीं किया गया था। आरसी के लिए किए गए टेंडर प्रोसेस पर भी शक जाहिर किया गया था।
यहां तक कि सेबी ने भी उस कंपनी को अंडर स्क्रूटनी बताया था। दिल्ली में उस कंपनी के अनुभव को वेरिफाई नहीं किया गया। निगोशिएशन कमिटी ने भी जो सिफारिशें कीं, उन्हें भी नजरअंदाज कर दिया गया। इस कमिटी ने रेट कम करने की बात कही थी।
अदालत जाएगा मामला
तब टेंडर में कहीं नहीं लिखा था कि उस कंपनी को 40 लाख कार्ड बनाने की गारंटी दी जाएगी लेकिन बाद में यह शर्त जोड़ दी गई और यहां तक लिख दिया गया कि अगर इतने कार्ड नहीं बने तो प्रति कार्ड 50 रुपये का हर्जाना भी दिया जाएगा।
टेंडर के नोटिफिकेशन के लिए एलजी से स्वीकृति भी नहीं ली गई थी। लोगों पर प्रति कार्ड 200 रुपये का अतिरिक्त बोझ डाला गया, जबकि कानूनी रूप से यह जरूरी नहीं था।
पीएसी ने रिपोर्ट में कहा था कि इस फ्रॉड में परिवहन विभाग की मिलीभगत है। इसलिए अग्रीमेंट समाप्त कर दिया जाना चाहिए। अब शोंख टेक्नालॉजी मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाने जा रही है।