दिल्ली के तख्त पर काबिज होने वाली पहली महिला रजिया सुल्तान का मकबरा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक होने के बावजूद खस्ता हालत में है। भारतीय इतिहास में अहम भूमिका निभाने के कारण रजिया सुल्तान के मकबरे के संरक्षण और उसकी देखरेख का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तहत होता है। लोगों का कहना है कि विदेशों से भी पर्यटक इस मकबरे को देखने के लिए आते हैं लेकिन फिर भी सरकारों ने इसके लिए कुछ नहीं किया है।
पुरानी दिल्ली के बुलबुलीखाना की तंग गलियों के बीच बने होने के कारण मकबरे तक पहुंचने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। मकबरे की ओर जाने वाली सारी गलियां टूटी-फूटी पड़ी हैं जिन्हें देखकर कतई ऐसा नहीं लगता है कि वो इतिहास की इतनी अहम शख्सियत के मकबरे की ओर जा रही हैं। मकबरे और रजिया के बारे में जानकारी देने के लिए हिंदी और अंग्रेजी में एक बोर्ड लगाया गया है, वो भी फूटा पड़ा है। हरियाणा के कैथल में जान गंवाने के बाद रजिया सुल्तान को जहां दफनाया गया था, विदेशी पर्यटक भी रजिया की ख्याति के कारण उनके मकबरे को देखने आते हैं।
सुरक्षाकर्मी है लेकिन कभी आता नहीं
मकबरे में आसपास रहने वाले लोगों के नमाज के लिए थोड़ी सी जगह बनाई गई है। इसके लिए एक मौलवी भी रखे गए हैं। अपनी गैर मौजूदगी में मकबरे की देखरेख के लिए मौलवी ने शोएब नाम के शख्स को नियुक्त किया हुआ है। शोएब बताते हैं कि लालकिला और बाकी अहम स्मारकों की तरह ही यहां पर भी एक सुरक्षाकर्मी को नियुक्त तो किया गया है पर वो कभी-कभी ही यहां आता है। उनका कहना है कि पर्यटकों के लिए रजिया सुल्तान या मकबरे के इतिहास की जानकारी के लिए कुछ सुविधा नहीं है। यहां देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। यदि उनके साथ गाइड होता है तो वो उन्हें इतिहास बता देता है नहीं तो लोग ऐसे ही लौट जाते हैं।
रजिया के साथ उनकी बहन का भी है मकबरा
सन 1236 से 1240 तक राज करने वाली रजिया के मकबरे के साथ एक और मकबरा बना हुआ है। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक वो मकबरा उनकी बहन शाजिया का है। शोएब ने बताया कि आमतौर पर भी यही माना जाता है कि रजिया से बहुत अधिक प्रेम होने के कारण उनकी बहन ने रजिया के साथ ही दफनाए जाने की मांग की थी। 1980 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने रजिया सुल्तान के मकबरे को राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों में शामिल किया था।