गुड़गांव लोकसभा सीट पर कई दावेदारों को पछाड़कर राव इंद्रजीत सिंह भाजपा का टिकट लेने में भले सफल हो गए, लेकिन प्रचार के दौरान उन्हें उन सवालों से जूझना होगा, जिसको आधार बनाकर वह कांग्रेस से अलग हुए हैं।
दिल्ली से सटे प्रतिष्ठित संसदीय क्षेत्र गुड़गांव से भाजपा टिकट के करीब आधा दर्जन दावेदार थे। इनमें अधिकांश पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। राव इंद्रजीत सिंह ने टिकट पाने में पार्टी के सारे पुराने धुरंधरों को पीछे छोड़ दिया।
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राव इंद्रजीत और उनके परिजन कट्टर कांग्रेसी रहे हैं। वह खुद बताते हैं कि जब कांग्रेस संकट में थी, तो वह और उनके परिजनों ने कांग्रेस का झंडा हरियाणा में बुलंद रखा था। वह खुद गुड़गांव-महेंद्रगढ़ संसदीय सीट से कांग्रेस की टिकट पर तीन बार चुनाव जीत चुके हैं।
पिछले चुनाव में उन्होंने बसपा उम्मीदवार जाकिर हुसैन को हराया था। बाद में वह मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आरोप लगाकर बागी हो गए कि सरकार दक्षिण हरियाणा की उपेक्षा कर रही है।
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गुड़गांव, हरियाणा सरकार को सर्वाधिक रेवेन्यू देने वाला शहर है फिर भी साइबर सिटी विकास के मामले में उपेक्षित है। यहां की बजाए तमाम विकासात्मक योजनाओं का रुख हुड्डा ने अपने पैतृक जिले रोहतक की ओर कर रखा है। यहां तक नौकरियों में भी उनके जिले के आवेदकों को तरजीह दी जाती है।
कांग्रेस छोड़ने तक राव इंद्रजीत सिंह प्रदेशभर में घूमकर प्रचारित करते रहे कि दक्षिण हरियाणा सहित तमाम प्रदेश के सारे पिछड़े इलाके का विकास उनके चंडीगढ़ की कुर्सी संभालने के बाद ही संभव है। अपनी इन बातों को प्रचारित करने के लिए उन्हें एक गैर राजनीतिक संगठन हरियाणा इंसाफ मंच का भी गठन किया। भाजपा में जाने के बावजूद यह मंच आज भी सक्रिय है।
भाजपा में जाते ही राव साहब की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। उनसे जब पूछने पर कि आप मुख्यमंत्री बनकर हक दिलाने की बात कर रहे थे। अब संसद का चुनाव लड़ रहे हैं। इस पर उनका जवाब है कि अभी मोदी को जीत दिलाना है विधानसभा चुनाव की बात बाद में की जाएगी।