अक्टूबर से दिसंबर तक हर साल दिल्ली का दम प्रदूषण से घुटने लगता है। इसके लिए हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा पराली जलाने को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस साल पराली प्रदूषण का कारण नहीं बनेगी। इसका कारण यह है कि दिल्ली सरकार ने पूसा के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ऐसी दवाई तैयार की है, जो सिर्फ 15 दिन में पराली को खाद में बदल देगी। इससे एक तरफ जहां पराली से प्रदूषण नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर जैविक खाद मिलने से खेतों की उर्वरा शक्ति में भी बढ़ोतरी होगी।
सरकार के इस प्रयास के बीच पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाओं की शुरुआत हो चुकी है। केंद्र सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए 50 कमेटियों का गठन कर इस पर लगाम लगाने की बात कही है, लेकिन किसानों का कहना है कि पराली जलाने से रोकने के लिए उन्हें कोई विकल्प नहीं उपलब्ध कराया गया है। यही कारण है कि वे पराली जलाने पर मजबूर हो गए हैं।
किसान नेता चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि पराली किसानों के लिए वरदान है। उन्हें किसी भी कीमत पर इसे जलाना नहीं चाहिए। इसकी बजाय उसका निबटान करने के लिए वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका सबसे बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि केंद्र सरकार खेती को भी मनरेगा से जोड़ दे। इससे लगभग 200 रुपये की दैनिक मजदूरी पर केंद्र सरकार की तरफ से मजदूरों को मिल जाएगी, अगर किसान उन्हें मजदूरी के शेष 100-150 रुपये देकर पराली हाथ से कटवाते हैं तो इसे पशुओं के चारे में इस्तेमाल किया जा सकेगा। पराली निबटाने का यह पूर्णतया जैविक उपाय होगा।