अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने कहा कि जीवन रक्षक दवाओं के खिलाफ इंजंक्शन (निषेधाज्ञा) देने से पहले अदालतों को सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। कोर्ट ने पेटेंट अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ आम जनता, खासकर मरीजों की पहुंच को जीवनदायी दवाओं तक सुनिश्चित करना भी अदालत की जिम्मेदारी है।
यह फैसला न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने दिया। मामला जायदस लाइफसाइंसेज लिमिटेड बनाम ईआर स्क्विब एंड संस एलएलसी से जुड़ा था। जायदस ने कैंसर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा निवोलुमैब के बायोसिमिलर संस्करण जेडआरसी 3276 को बाजार में उतारने की तैयारी की थी। इसे मूल पेटेंट धारक कंपनी ने पेटेंट उल्लंघन का आरोप लगाते हुए रोका था। एकल बेंच ने पहले अंतरिम इंजंक्शन जारी कर जायदस को दवा बनाने और बेचने से रोक दिया था। डिवीजन बेंच ने आदेश में संशोधन करते हुए इंजंक्शन को हटा दिया।
कोर्ट ने कहा कि पेटेंट की समाप्ति मई 2026 की शुरुआत में होने वाली है, इसलिए इतने कम समय के लिए दवा को बाजार से पूरी तरह बाहर रखना उचित नहीं। कोर्ट ने कहा कि जीवन रक्षक दवा होने का मतलब यह नहीं कि निषेधाज्ञा से पूरी तरह सुरक्षा मिल जाए।