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Delhi NCR News: प्रोस्टेट कैंसर में अब सिर्फ ट्यूमर पर निशाना, पूरी ग्रंथि निकालने की जरूरत नहीं

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फोकल एचआईएफयू से इलाज की पहल, चुनिंदा मरीजों में पेशाब और यौन क्षमता पर असर का जोखिम कम करने की उम्मीद
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-राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर ने इस तकनीक को उपचार कार्यक्रम में शामिल किया

अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। प्रोस्टेट कैंसर के कुछ चुनिंदा मरीजों के लिए इलाज का ऐसा विकल्प सामने आया है, जिसमें पूरी प्रोस्टेट ग्रंथि निकालने के बजाय कैंसर से प्रभावित हिस्से को ही निशाना बनाया जाता है। राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर ने लोकलाइज्ड प्रोस्टेट कैंसर के उपयुक्त मरीजों के लिए फोकल हाई-इंटेंसिटी फोकस्ड अल्ट्रासाउंड (एचआईएफयू) को अपने उपचार कार्यक्रम में शामिल किया है।
इस तकनीक में विशेष प्रकार की अल्ट्रासाउंड ऊर्जा को प्रोस्टेट के कैंसर प्रभावित हिस्से पर केंद्रित किया जाता है। इससे उस हिस्से की कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने की कोशिश की जाती है, जबकि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को बचाने पर जोर रहता है। डॉक्टरों के मुताबिक, सही मरीजों में यह तरीका पारंपरिक उपचार की तुलना में पेशाब पर नियंत्रण और यौन क्षमता से जुड़ी समस्याओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। यह अपेक्षाकृत कम चीर-फाड़ वाला उपचार है और मरीज की रिकवरी भी तेजी से हो सकती है।
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संस्थान ने यूरोपियन यूरोलॉजी में प्रकाशित 10 साल के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का हवाला दिया है। इसमें एचआईएफयू और क्रायोथेरेपी से इलाज कराने वाले 3,477 पुरुषों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। लंबे समय के फॉलोअप में प्रोस्टेट कैंसर से मौत की दर 0.13 प्रतिशत और कैंसर के शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने की दर 3.3 प्रतिशत रही। शोधकर्ताओं के अनुसार, उचित रूप से चुने गए लोकलाइज्ड प्रोस्टेट कैंसर मरीजों में फोकल एचआईएफयू को सर्जरी और रेडियोथेरेपी के साथ संभावित उपचार विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।
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हर मरीज के लिए नहीं है यह इलाज
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट के मेडिकल डायरेक्टर और जेनिटोयूरिनरी ऑन्कोलॉजी प्रमुख डॉ. सुधीर रावल ने बताया कि एचआईएफयू का इस्तेमाल अब पूरी प्रोस्टेट ग्रंथि का इलाज करने के बजाय कैंसर वाले हिस्से को लक्षित करने की दिशा में बढ़ रहा है। हालांकि, यह विकल्प हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। मरीज का पीएसए स्तर, मल्टीपैरामेट्रिक एमआरआई, टारगेटेड बायोप्सी, ट्यूमर की जगह और उसकी प्रकृति जैसे कई पहलुओं का आकलन किया जाता है। विशेषज्ञों की टीम की राय के बाद ही मरीज का चयन किया जाता है।
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