-आयोजन बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग और बाल रोग विभाग के सहयोग से किया गया
-2000 से अधिक बच्चों का मूल्यांकन में लगभग 80 फीसदी में मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहार संबंधी समस्याएं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। ऑटिज्म जागरूकता माह के अवसर पर बृहस्पतिवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्याख्यान का आयोजन किया गया। ऑटिज्म जागरूकता माह हर वर्ष अप्रैल में विश्वभर में मनाया जाता है और इस वर्ष की संयुक्त राष्ट्र थीम ऑटिज्म और मानवता : हर जीवन का महत्व है। यह आयोजन बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग और बाल रोग विभाग के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) की जटिलताओं, सह-रुग्णताओं और शुरुआती पहचान के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई।
बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग और बाल रोग विभाग की प्रभारी प्रो. शेफाली गुलाटी ने बताया कि एएसडी एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जिसकी पहचान आमतौर पर 12-18 महीने की उम्र में संभव होती है। उन्होंने सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के 2025 के अनुमान का हवाला देते हुए बताया कि हर 31 में से 1 व्यक्ति में इसका निदान पाया जाता है। एम्स के बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2000 से अधिक बच्चों का मूल्यांकन में लगभग 80 फीसदी में मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहार संबंधी समस्याएं और नींद से जुड़ी दिक्कतें जैसी सह-रुग्णताएं पाई गई हैं।
कई कारकों पर शोध जारी
प्रो. गुलाटी ने बताया कि पर्यावरणीय कारण, जीवनशैली और शहरीकरण जैसे कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं। कारणों पर शोध जारी है और इन्हें सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं माना गया है। इनपर शोध जारी है। कार्यक्रम में बताया गया कि जिन बच्चों में हाइपरएक्टिविटी और नींद की समस्या अधिक होती है, उनमें कार्यात्मक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे मामलों में बहु-विषयक देखभाल और मनोसामाजिक सहयोग बेहद जरूरी है।
परिवार-केंद्रित हस्तक्षेप रणनीतियों पर जोर
व्याख्यान में प्रारंभिक, व्यक्तिगत और परिवार-केंद्रित हस्तक्षेप रणनीतियों पर जोर दिया गया, जिससे बच्चों के विकास में सुधार देखा जा सकता है। साथ ही, पूरक व वैकल्पिक चिकित्सा (सीएएस) के उपयोग, पैरासिटामोल और टीकों से जुड़े मिथकों और ल्यूकोवोरिन जैसी उभरती उपचार पद्धतियों पर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चर्चा की गई। कार्यक्रम में शैक्षिक सामग्री भी जारी की गई। वहीं, एम्स द्वारा चलाए जा रहे 24×7 हेल्पलाइन, ईमेल सहायता और डिजिटल संसाधनों को भी प्रस्तुत किया गया, जिनका उद्देश्य शीघ्र पहचान, बेहतर उपचार और जागरूकता बढ़ाना है।