डीयू का छात्र रहा संतोष सिंह जिसे 1996 के प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली थी वह जल्द ही रिहा हो सकता है। दरअसल संतोष उन कैदियों की लिस्ट में शुमार है जिनकी रिहाई सरकार समय से पहले कर सकती है।
संतोष सिंह को दिल्ली हाईकोर्ट ने 2006 में मौत की सजा सुनाई थी और तब से ही वह जेल में है। हालांकि मौत की ये सजा सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2010 में आजीवन कारावास में बदल दी गई थी। मालूम हो कि 2006 में जिस वक्त संतोष को गिरफ्तार किया गया था उस वक्त वो वकालत की प्रैक्टिस कर रहा था और जेल में उसका रिकॉर्ड भी साफ सुथरा रहा है। जेल अधिकारी ने बताया कि सजा खत्म होने से पहले छोड़े जाने के लिए संतोष के नाम पर पहली बार विचार किया गया है।
अगर संतोष के व्यक्तिगत परिचय पर जाएं तो उसका परिवार एक हाई प्रोफाइल परिवार है। वह आईपीएस अधिकारी जेपी सिंह का बेटा है, जो 1996 में जब वारदात हुई तो दिल्ली में संयुक्त पुलिस कमिश्नर थे। संतोष को थर्ड ईयर लॉ की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टू से रेप और फिर उसका मर्डर करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 23 वर्षीय प्रियदर्शिनी वसंत विहार में अपने घर पर मृत पायी गई थी। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि संतोष दो साल से मट्टू का पीछा कर रहा था। दोनों ही दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई कर रहे थे। 1999 में दिल्ली की एक जिला अदालत ने संतोष को यह कहकर रिहा कर दिया था कि पुलिस उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं जुटा सकी।
अदालत के इस फैसले के बाद पूरे देश में आक्रोश की लहर फैल गई थी। तब तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण तक ने कह दिया था कि, 'न्याय का मंदिर अब कसीनो बनकर रह गए हैं।' पुलिस ने इस मामले में हाईकोर्ट में अपील की जहां संतोष को 2006 में मौत की सजा सुनाई गई जो बाद में आजीवन कारावास में बदल गई। जेल से रिहा होने वाली लिस्ट में संतोष का नाम आने पर जेल अधिकारियों ने कहा कि हम अपने कर्तव्य से बंधे हुए हैं। जेल के नियमों के अनुसार हमें संतोष का नाम एसआरबी को देना ही पड़ा। उसका अब तक का रिकॉर्ड बिल्कुल साफ-सुथरा है और उसने 14 साल के अब तक के कारावास में एक भी नियम नहीं तोड़े हैं।
19 साल पहले वर्ष 1999 में दिल्ली के महरौली स्थित कुतुब कोलोनेड रेस्टोरेंट में शराब परोसने के लिए मना करने पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विनोद शर्मा के बेटे मनु शर्मा ने जेसिका लाल नामक लड़की की गोली मारकर हत्या कर दी।
उसके बाद मनु अपने दोस्तों के साथ फरार हो गया। मौके पर पहुंची पुलिस ने इस मामले में 101 गवाह बनाए जिसमें श्यान मुंशी मामले का शिकायती बना और उसी के बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई।
लेकिन सुनवाई के दौरान मुख्य गवाह श्यान मुंशी अपने बयान से मुकर गया। मामले की लंबी सुनवाई के दौरान मनु को जमानत मिल गई थी। मनु की ओर से हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मनु शर्मा की ओर से पेश दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
बाद में मनु की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई। लंबी सुनवाई के बाद मनु शर्मा को 20 जनवरी, 2006 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई, तब से वह जेल में सजा काट रहा है। इस घटना पर 'नो वन किल्ड जेसिका' नाम की बॉलीवुड फिल्म भी बन चुकी है।
क्रूरता की हदें पार करने वाले इस वाकये को तंदूर हत्याकांड के नाम से जानते हैं। कहानी 22 साल पहले की है। तत्कालीन दिल्ली युवक कांग्रेस के अध्यक्ष व विधायक सुशील शर्मा ने निर्दयता से अपनी पायलट पत्नी नैना साहनी की हत्याकर लाश ठिकाने लगा दी थी।
वो तो भला हो कूड़ा बीनने वाली उस वृद्ध महिला का जिसने आधी रात को अशोक यात्री निवास से धुआं निकलता देखा और सजगता दिखाई। ये वही यात्री निवास था जिसका मालिक सुशील था।
आरोप है कि सुशील को शक था कि उसकी पत्नी का किसी और के साथ संबंध है। इसी वजह से उसने आधी रात को अपने ही घर में गोली मारकर हत्या की दी और उसके शव को कई टुकड़ों में काट दिया।
शव को छिपाने के लिए शर्मा ने उसी रात दिल्ली के बगिया रेस्टोरेंट के तंदूर में डाल दिया था। लंबी जद्दोजहद के बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई। बाद में उसे सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दी। सुशील अभी जेल में है।