-किताब-कॉपियों व स्टेशनरी की कीमतों में स्कूल की श्रेणी के हिसाब से पांच से दस फीसदी तक की बढ़ोतरी
-पहली-दूसरी की एनसीआरटी की किताबें 500-600 में उपलब्ध, निजी स्कूल स्टेशनरी मिलाकर चार से छह हजार में दे रहे
- स्कूल प्रबंधन बाजार से किताबें खरीदने की नहीं देता अनुमति
रश्मि शर्मा
नई दिल्ली । एक अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है। सत्र से पहले ही महंगी कॉपी-किताबों और स्टेशनरी के कारण अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है। किताबों से ज्यादा कॉपियों कीमतों से अभिभावक परेशान हैं। बीते साल के मुकाबले इस साल केवल कॉपी-किताबों व स्टेशनरी कीमतों में स्कूलों की श्रेणी के हिसाब से पांच से दस फीसदी तक की बढ़ोतरी हो गई हैं। निजी स्कूल छात्रों को निजी प्रकाशकों की किताबें ही दे रहे हैं, जो एनसीईआरटी के मुकाबले तीन से चार गुणा तक महंगी हैं।
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल इस साल भी शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों की अनदेखी करते हुए निजी प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य कर रहे हैं। पहली व दूसरी कक्षा में मुख्य तीन विषयों की एनसीईआरटी की तीन किताबें 400 से 500 रुपये तक मिल जाती हैं। वहीं, निजी स्कूल किताबों के साथ स्टेशनरी मिलाकर चार से छह हजार में उपलब्ध करा रहे हैं। ऊंची कक्षाओं के किताब व कॉपी के सेट की कीमट आठ से दस हजार रुपये है।
अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन उन्हें बाजार से किताबें खरीदने की अनुमति नहीं देते। स्कूल से निर्धारित दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
वेबसाइट पर पांच दुकानों की सूची नहीं
शिक्षा निदेशालय हर साल स्कूलों को केवल एनसीईआरटी या निर्धारित सिलेबस की किताबें ही अनिवार्य करने और किसी खास दुकान या प्रकाशक को बढ़ावा नहीं देने का निर्देश जारी करता है। लेकिन, अभिभावकों का कहना है कि आदेश देर से जारी किए जाते हैं, जिसका फायदा स्कूल प्रबंधन उठाते हैं और पहले ही किताबें बेच देते हैं।
निदेशालय नए सत्र से पहले निजी स्कूूलों को अपनी वेबसाइट पर कम से कम पांच दुकानों की सूची जारी करने का आदेश भी देता है, लेकिन वेबसाइट पर दुकानों के नामों की सूची नहीं मिली।
साल बदल गया, सूरत नहीं बदली
दिल्ली अभिभावक संघ की अध्यक्ष अपराजिता गौतम कहती हैं कि निजी स्कूलों में प्राइवेट प्रकाशकों की किताबें, कॉपी व स्टेशनरी देने का खेल शुरू हो चुका है। साल बदल गया है, लेकिन सूरत नहीं बदली। अब अभिभावक इनसे थकने लगे हैं। प्लास्टिक कवर व लोगो लगाकर ज्यादा कीमत पर कॉपियों बेचीं जातीं हैं। बुक सेट जो स्कूल से लेना अनिवार्य है, उसे तोड़कर नहीं लिया जा सकता। हर साल यही होता है लेकिन अधिकारी कार्रवाई नहीं करते हैं।
बिगड़ गया है बजट
बीते साल छठी कक्षा की किताबों का पूरा सेट 8 हजार रुपये का था, जो कि इस बार 9 हजार तक कर दिया गया है। मंहगी किताबों व कॉपी के कारण बजट बिगड़ गया है। बॉबी(अभिभावक)
बेटा पांचवी कक्षा में पढ़ता है, बेटी दूसरी कक्षा में है। इस बार भी किताबें मंहगी हो गईं हैं। अभी बताया गया है कि दोनों बच्चों की कॉपी-किताबों का खर्च 13 हजार रुपये आएगा। दीपा
-
मेरे दो लड़के दिलशाद गार्डन के एक निजी स्कूल में पढ़ते हैं। स्कूल से ही पता चला है कि किताब-कॉपी के लिए इस बार ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। इससे बोझ बढ़ गया है। -रश्मि