इसे राजधानी के आपदा प्रबंधन तंत्र में बड़े प्रशासनिक फेरबदल का संकेत माना जा रहा है। इस बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, मंत्रियों, मुख्य सचिव और संबंधित एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। एलजी ने जलभराव वाले चिन्हित स्थलों पर तत्काल क्षमता बढ़ाने, एसडीआरएफ को और मजबूत करने, मोबाइल हैवी ड्यूटी पंप हर समय तैयार रखने व दिल्ली, यमुना और बाढ़ प्रबंधन को लेकर एनसीआर के पड़ोसी राज्यों के साथ भी बेहतर समन्वय बनाने के निर्देश दिए हैं।
जवाबदेही तय करने की तैयारी
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि बारिश और बाढ़ जैसी आपात स्थिति में किसी विभाग को अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने की छूट नहीं दी जाएगी। दिल्ली में हर मानसून के दौरान एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग, डीएसआईआईडीसी, जिला प्रशासन और अन्य एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। एलजी ने सभी विभागों को एकीकृत कमान के तहत समन्वय के साथ काम करने और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा।
जलभराव वाले इलाकों पर विशेष फोकस
एलजी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन स्थानों पर जलभराव की आशंका बनी रहती है, वहां तुरंत अतिरिक्त पंपिंग क्षमता और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। मोबाइल हैवी ड्यूटी पंप हर समय चालू हालत में रहें ताकि जरूरत पड़ते ही उन्हें प्रभावित क्षेत्रों में भेजा जा सके। साथ ही जमीनी हालात और नागरिकों से मिलने वाली शिकायतों की रियल टाइम निगरानी करने के भी निर्देश दिए गए।
एसडीआरएफ को और मजबूत किया जाएगा
बैठक में दिल्ली राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल की क्षमता बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए हैं। बचाव उपकरण, संसाधन और तुरंत और तेज प्रतिक्रिया व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के निर्देश दिए गए है, ताकि भारी बारिश या बाढ़ जैसी स्थिति में राहत कार्य बिना देरी शुरू हो सकें।
एनसीआर राज्यों के साथ बनेगा साझा तंत्र
यमुना के जलस्तर और बाढ़ की चुनौती को देखते हुए एलजी ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य एनसीआर राज्यों के साथ बेहतर समन्वय विकसित करने के लिए कहा है। उनका कहना था कि बाढ़ और जलभराव जैसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अंतरराज्यीय समन्वय बेहद जरूरी है।
सरकार का दावा, घटे जलभराव के हॉटस्पॉट
बैठक में अधिकारियों ने एलजी को बताया कि राजधानी में चिन्हित जलभराव वाले स्थलों की संख्या लगातार कम हुई है। साल 2024 में ऐसे 194 स्थान थे, जो 2025 में घटकर 169 रह गए थे और अब 2026 में केवल 34 हॉटस्पॉट चिन्हित किए गए हैं। सरकार ने इसे बेहतर योजना, विभिन्न एजेंसियों के समन्वय और लगातार निगरानी का परिणाम बताया। हालांकि अब असली परीक्षा मानसून के चरम दौर में होगी, जब यह स्पष्ट होगा कि यह तैयारी जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है।