ऐसे मरीजों में सांस फूलना, छाती में जकड़न, बेहोस होना सहित दूसरी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। कई मरीजों में गंभीरता को देखते हुए भर्ती तक करना पड़ रहा है। वहीं प्रदूषण के कारण बच्चे भी काफी परेशान हो रहे हैं। एक साल से सात साल के के बच्चों में लगातार खांसी, रात को सोते समय रोना, जोर-जोर से सांस लेने जैसी दिक्कत दिख रही हैं। ऐसे बच्चों को दवाओं के साथ भाप देने की सलाह दी जा रही हैं।
गुरु तेग बहादुर अस्पताल के श्वसन औषधि विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंकिता गुप्ता ने कहा कि प्रदूषण बढ़ने के बाद गंभीर मरीजों की मौजूदा दवा की डोज काम नहीं कर रही। ऐेसे मरीजों की दवाओं की डोज बढ़ानी पड़ रही है। दिन में इनहेलर लेने का समय बढ़ाया गया है। इसके अलावा वैक्सीनेशन भी करवा रहे हैं। पीएम 2.5 के कारण नाक से फेफड़े तक की नली प्रभावित हो जाती है। ऐसे में मरीजों को विशेष सतर्क रहने के साथ डॉक्टरों के संपर्क में रहने की सलाह दी गई है।
सीओपीडी दिवस पर चलाया गया जागरूकता अभियान
विश्व क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) दिवस के अवसर पर बुधवार को जीटीबी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, सफदरजंग सहित दूसरे अस्पतालों में जागरूकता अभियान चलाया गया। डॉक्टरों ने इस दौरान रोग के लक्षण, जल्द इलाज, रोग से होने वाली तकलीफ, परिवार के दूसरे सदस्य तक प्रसार सहित दूसरी समस्याओं के बारे में मरीजों व उनके परिजनों को बताया।
डॉक्टरों ने कहा कि मौसम बदलने के साथ ऐसे मरीजों की समस्या बढ़ती है। इसमें प्रदूषण से समस्या को दोगुना कर दिया है। उन्होंने कहा कि सीओपीडी एक गंभीर बीमारी है, जो फेफड़ों की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे प्रभावित करती है। इस बीमारी में फेफड़ों में हवा के प्रवाह में रुकावट आ जाती है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। यह बीमारी आमतौर पर धूम्रपान करने वालों में अधिक पाई जाती है, लेकिन प्रदूषण, अनुवांशिक कारण, या फेफड़ों में किसी प्रकार के संक्रमण के कारण भी यह हो सकती है।