फरीदाबाद में कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस पिछले चार माह में तीन बार पिट चुकी है। पिछले दिनों अग्निकांड के कथित पीड़ितों के हाथों बल्लभगढ़ डीसीपी की पिटाई के मामले में रिपोर्ट तक नहीं दर्ज की गई।
जिन दो घटनाओं में रिपोर्ट दर्ज की गई, उनमें भी पुलिस ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है। इससे अराजकतत्वों के हौसले बुलंद हैं। वह जब पुलिस को नहीं छोड़ रहे तो आम आदमी की क्या बिसात। कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ कार्रवाई के सवाल पर आला अधिकारी बोलने से भी कतरा रहे हैं।
एक सिपाही हो गया था लहूलुहान
एनआईटी दशहरा ग्राउंड में मंगलवार को आग लगने से करीब 250 पटाखे की दुकानें खाक हो गईं थीं। बुधवार को इन कथित पटाखा दुकानदारों ने बीके चौक पर जाम लगा दिया था।
भारी पुलिस फोर्स के साथ पहुंचे डीसीपी बल्लभगढ़ देवेंद्र यादव के साथ अराजकतत्वों ने हाथापाई की। यहां तक कि उनकी वर्दी पर हाथ डाला गया, लेकिन पुलिस बल मूकदर्शक बना देखता रहा। अफसोसनाक यह रहा कि पुलिस आयुक्त ने घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने से इनकार कर दिया। बोले कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं।
13 सितंबर को मलेरना रोड पर सड़क हादसे में एक बच्चे की मौत हो गई थी। मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों को गांव वालों ने जमकर पीटा था। एक सिपाही लहूलुहान भी हो गया था। सिपाही जान बचाने के लिए बाइक छोड़कर भागे थे। मामले में रिपोर्ट तो दर्ज हुई, लेकिन पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
'अराजकतत्वों के बीच पुलिस का डर खत्म होता जा रहा है'
जुलाई में दुर्गा बिल्डर एरिया का अतिक्रमण हटवाने गए नवीन नगर पुलिस चौकी के जवानों को भीड़ ने पीट दिया था। भीड़ ने एक सब इंस्पेक्टर को भी पीटा था। इस मामले में भी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की, लेकिन कार्रवाई ठंडे बस्ते में है।
एक पुलिसकर्मी ने नाम न छापने के अनुरोध पर कहा कि जब बड़े अधिकारियों के साथ बदसुलूकी की रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती तो हम छोटों की क्या औकात? अब तो छोटे-मोटे नेता भी गाली देकर चले जाते हैं, हम कुछ नहीं कर सकते।
एसआई स्तर के एक अधिकारी ने कहा कि अपराधियों और अराजकतत्वों के बीच पुलिस का डर खत्म होता जा रहा है। वह इसका कारण पुलिस के कम होते अधिकारों को मानते हैं। बताया कि अब सात साल से कम सजा वाली धाराओं के अपराधियों को थाने से ही जमानत मिल जाती है। पुलिसकर्मी मेहनत कर अपराधी को पकड़ते हैं और वह थाना, नहीं तो कोर्ट से जमानत पर छूट जाता है।
राजनैतिक हस्तक्षेप भी पुलिसकर्मियों के मनोबल पर बुरा असर डाल रहा है। सब इंस्पेक्टर रैंक के एक अधिकारी ने कहा कि इधर हम मेहनत कर बदमाश को पकड़ते हैं थाने पहुंचने से पहले ही किसी न किसी बड़े अधिकारी के फोन पर उसे छोड़ना पड़ता है।
डीसीपी पर हमले के मामले में भी वह राजनैतिक दखल को रिपोर्ट न लिखे जाने की वजह बताते हैं। इसके अलावा मानवाधिकार, डीके बसु गाइड लाइंस, मौलिक अधिकार जैसे अन्य अंकुश हैं जिनके डर से पुलिस कोई सख्त कदम उठाने से डरती है।
संयुक्त पुलिस आयुक्त भारती अरोड़ा से जब इस बारे में पूछा गया तो वो बोलीं कि चंडीगढ़ में मीटिंग में आई हूं। पुलिसकर्मियों से अभद्रता के मामलों के संबंध में मैं अभी कुछ नहीं कह सकती।