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Delhi NCR News: शाहीन बाग कब्रिस्तान में पत्नी के कब्र के दोबारा इस्तेमाल पर रोक की मांग खारिज

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अदालत ने कहा- सार्वजनिक कब्रिस्तान की सीमित जमीन पर किसी एक व्यक्ति का स्थायी अधिकार नहीं
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। साकेत कोर्ट ने शाहीन बाग कब्रिस्तान में दफन अपनी पत्नी की कब्र का दोबारा इस्तेमाल रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक कब्रिस्तान की सीमित भूमि पर किसी एक व्यक्ति का स्थायी और विशेष अधिकार स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत ने यह आदेश निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।
याचिकाकर्ता की पत्नी को अप्रैल 2021 में शाहीन बाग कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उसने अदालत से कब्र को दोबारा इस्तेमाल करने पर रोक लगाने की अंतरिम राहत मांगी थी। उसका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार जब तक शव पूरी तरह मिट्टी में नहीं मिल जाता, तब तक कब्र को दोबारा नहीं खोला जाना चाहिए। उसने यह भी दावा किया कि कम से कम सात वर्ष तक कब्र का पुन: उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
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सुनवाई के दौरान कब्रिस्तान प्रबंधन समिति और देखरेख करने वाले पक्ष ने अदालत को बताया कि कब्रिस्तान में दफनाने के लिए जगह की गंभीर कमी है। ऐसे में आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए कब्र का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस्लामी कानून के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में कब्र को नहीं छेड़ा जाता, लेकिन सार्वजनिक कब्रिस्तान में स्थान की कमी होने पर कुछ परिस्थितियों में उसका पुन: उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, पहले दफन किए गए व्यक्ति की हड्डियों को हटाने की अनुमति नहीं है।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैज्ञानिक या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि उसकी पत्नी का शव अभी पूरी तरह मिट्टी में नहीं मिला है या कब्र के पुन: उपयोग से पहले सात वर्ष का इंतजार करना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल अंतरिम राहत की मांग पर पारित किया गया है। मुख्य वाद की सुनवाई जारी रहेगी और याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य पेश कर सकेगा। अदालत ने माना कि निचली अदालत के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं है, इसलिए अपील खारिज कर दी गई।
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