याचिका में कहा गया है कि कई स्थानों, जिनमें उत्तर प्रदेश के कैसरगंज और बहराइच शामिल हैं पर साधारण नागरिकों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए, जबकि वे सिर्फ अपने धार्मिक उत्सवों में पोस्टर-बैनर लगाकर और शांतिपूर्ण जुलूस निकालकर आस्था व्यक्त कर रहे थे।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना किसी ठोस सबूत के उन्हें दंगाई, भयादोहन और शांति भंग करने जैसे संगीन आरोपों में फंसा दिया गया। उन्होंने कहा कि यह एफआईआर सांप्रदायिक प्रवृत्ति वाली हैं और इनका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक अभिव्यक्ति को अपराध घोषित करना है।
विवाद की शुरुआत 9 सितंबर को हुई थी, जब कानपुर में बारावफात जुलूस के दौरान सार्वजनिक मार्ग पर ‘आई लव मोहम्मद’ लिखे बोर्ड लगाए जाने पर पुलिस ने नौ नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
मामले ने तूल पकड़ते हुए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तक का ध्यान खींचा, जिन्होंने कहा था कि ‘आई लव मोहम्मद’ कहना कोई अपराध नहीं है। धीरे-धीरे यह विवाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों से निकलकर उत्तराखंड और कर्नाटक तक फैल गया, जहां विरोध-प्रदर्शन और पुलिस की सख्ती देखने को मिली।