पिंकी की उम्र महज 22 साल थी। उसके घरवाले उसपर नाज करते थे। इसलिए नहीं कि वह बहुत बहादुर थी बल्कि, इसलिए क्योंकि वह उस घर की शान थी। जितती होशियार वह पढ़ने में थी उतनी ही खेल-कूद में भी आगे। उसे दसवीं में उसे 94% अंक मिले थे जबकि, 12वीं में उसने 84% अंक हासिल किए थे।
पिंकी को अन्याय बिल्कुल पसंद नहीं था। इसलिए जब उसे पता चला कि कॉलेज प्रशासन ने कई लड़कियों को सिर्फ जीरो अंक देकर फेल कर दिया है तो वह खुद को रोक न सकी।
कॉलेज प्रशासन का विरोध करने के दौरान कथित रूप से कुछ टीचरों ने उसे इतना उकसाया कि उसने खुद को सरेआम आग लगा ली। 14 दिन जूझने के बाद रविवार को उसने दम तोड़ दिया। पिंकी की मां राजरानी चौहान ने बताया कि रविवार को उसके अंतिम संस्कार के बाद वह पूरी रात पिंकी के बिस्तर के पास बैठी रहीं।
इस मामले में पिंकी के परिवार वालों का कहना है कि पिंकी की मौत का कारण परीक्षा में मिले कम नंबर तक ही सीमित नहीं है। असल में मामला और भी गंभीर है जिसकी अनदेखी की जा रही है।
परिवार का कहना है कि यह पूरा मामला कॉलेज और यूनिवर्सिटी प्रशासन की उस लापरवाही का है जिसे लंबे अरसे से बहुत ही सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है।