साइबर सिटी के पीजी संचालकों ने नगर निगम की आंखों में धूल झोंक कर संपत्तिकर बचाने की भरपूर कोशिश की है। इससे हर साल नगर निगम को पीजी संचालकों द्वारा करोड़ों रुपये की चपत लगाई गई। संपत्तिकर बचाने के लिए ज्यादातर पीजी संचालकों ने नगर निगम में झूठा शपथ पत्र दाखिल कर अपनी संपत्ति को व्यवसायिक की जगह रिहायशी बताया है। इस प्रकार हर साल नगर निगम को एक करोड़ रुपये से अधिक रुपये की चपत लगती है।
मंगलवार को निगमायुक्त वी उमाशंकर ने शहर में संचालित सभी पीजी संचालकों के हलफनामे और मौका स्थिति की जांच करने के लिए अधिकारियों को आदेश जारी कर दिए हैं। पांच जुलाई को नाथूपुर में पीजी से नैनीताल के छात्र को पांचवीं मंजिल से फेंक कर हत्या करने का मामला सामने आया था। जिसमें निगम अधिकारियों से जब पुलिस ने पीजी का ब्यौरा मांगा तो नगर निगम ने उस जगह पर रिहायशी मकान होने की बात कही। उसके बाद पता चला की यहां पर तो कई साल से पीजी चल रहा है। उसके बाद साइबर सिटी में निगम अधिकारियों ने अचानक सर्वे किया तो पता चला कि ज्यादातर पीजी संचालकों ने झूठा शपथ पत्र देकर प्रॉपर्टी टैक्स की चोरी की है।
शहर में संचालित 292 पीजी संचालकों ने संपत्ति की श्रेणी में बदलाव कराया है। पहले इनकी संपत्ति पीजी, व्यवसायिक में दर्ज थी लेकिन पिछले दो साल से यह पीजी संचालक निगम को झूठा शपथ पत्र देकर करोड़ों रुपये की चपत लगा रहे हैं। व्यवसायिक संपत्ति धारकों पर साढ़े सात रुपये प्रति वर्ग फीट के हिसाब से संपत्तिकर की देनदारी बनती है। वहीं इस संपत्ति के रिहायशी में आने पर 300 वर्ग फीट एरिया के लिए केवल एक रुपये ही देना होता है। वहीं 300 से 500 वर्ग फीट एरिया के लिए महज चार रुपये संपत्तिकर देना होता है।
रिहायशी संपत्ति पर सबसे कम प्रॉपर्टी टैक्स
संपत्तिकर के लिहाज से शहर की सभी संपत्तियों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें से सबसे कम रिहायशी संपत्तियों पर टैक्स रखा गया है। वहीं व्यवसायिक एवं औद्योगिक संपत्तियों पर ज्यादा टैक्स का प्रावधान है। इसके लिए नगर निगम ने संपत्ति धारकों को खुद ही संपत्ति का एसेसमेंट करने एवं संपत्ति पर बनने वाली कर की राशि का भुगतान करने के आदेश दिए थे। इस संबंध में संपत्तिधारकों से निगम अधिकारियों ने घोषणा पत्र भी लिया था।
औचक सर्वे में हुआ खुलासा
निगम अधिकारियों ने पिछले दिन पीजी से रिहायशी में बदली संपत्तियों का औचक सर्वे किया था। इसमें पाया गया कि इन संपत्तिधारकों ने भले ही कागजों में संपत्ति की श्रेणी बदलवा ली। लेकिन अभी भी यहां पीजी का संचालन किया जा रहा है। ऐसे में अब निगमायुक्त ने पूरे शहर में संचालित छोटी बड़ी सभी तरह की पीजी की जांच कराने के आदेश दिए हैं। इसके लिए अलग अलग टीमों का गठन किया गया है।
15 दिन में आएगी जांच की रिपोर्ट
निगमायुक्त वी उमाशंकर के मुताबिक जांच के लिए गठित टीमों को 15 दिन के अंदर जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया है। जांच रिपोर्ट में यदि खामी पाई जाती है या हलफनामा झूठा पाया जाता है तो म्यूनिसिपल एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी।