नई दिल्ली।
दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को नीट पीजी 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ प्रतिशत में कमी के खिलाफ दायर जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि सीटों को खाली छोड़ना सार्वजनिक हित में नहीं है। याचिकाकर्ता संचित सेठ ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (एनबीईएमएस) के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ को 50वें प्रतिशत से घटाकर 7वें प्रतिशत तक और आरक्षित वर्गों के लिए शून्य प्रतिशत तक कर दिया था। इससे कई उम्मीदवारों को कम या नकारात्मक अंकों के साथ भी काउंसलिंग में भाग लेने की योग्यता मिल गई। याचिका में दावा किया गया था कि इससे डॉक्टरों की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
पीठ ने याचिकाकर्ता के तर्क पर कहा कि आप कह रहे कि इससे कम योग्यता वाले एमबीबीएस डॉक्टर पीजी में जाएंगे। पीजी का उद्देश्य किसी विशेष क्षेत्र में उन्हें अधिक कुशल बनाना है। ये परीक्षाएं डॉक्टरों की गुणवत्ता का आकलन नहीं करतीं। उन्हें पीजी कोर्स पूरा करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीट पीजी केवल प्रवेश परीक्षा है और विशेषज्ञता पीजी पढ़ाई के दौरान आती है। सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता टी सिंहदेव ने बताया कि काउंसलिंग के दो दौर के बाद लगभग 10,000 पीजी सीटें खाली रह गई थीं। केंद्र सरकार ने नीति के तहत कट-ऑफ कम करने का फैसला लिया ताकि सीटें भर सकें। उन्होंने कहा कि उच्च मेरिट वाले डॉक्टर कुछ कोर्स चुनते नहीं हैं, जबकि कम मेरिट वाले उन्हें चुन सकते हैं। इससे पूल बढ़ाने की जरूरत थी। कोर्ट ने कहा कि सीटों का खाली रहना सार्वजनिक हित के खिलाफ है। याचिकाकर्ता के वकील ने सीटें खाली न रहने की बात मानी, लेकिन उम्मीदवारों की गुणवत्ता पर चिंता जताई। पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह कदम आवश्यक था।