अस्पताल में भर्ती अपने मरीजों का गम भूलकर उनके तिमारदार सुबह से ही मोर्चरी के पास आ गए। अपनों के शवों को तलाश रहे लोगों की मदद की और उनके दुख में शामिल हुए।
मृतक के परिवार वाले जब अपनों को याद कर रहे थे तो मरीजों के तिमारदारों की आंखें नम थीं। यहां तैनात सिविल डिफेंस के पचास से अधिक कर्मचारी उनका विशेष ध्यान रख रहे थे।
उन्हें किसी तरह की कोई दिक्कत न हो इसका विशेष ध्यान रख रहे थे। करीब 12 बजे से परिजनों को शव सौंपने का काम शुरू कर दिया गया। किसी को शव ले जाने में किसी तरह का दिक्कत न हो इसके लिए एंबुलेंस के इंतजाम किया गया था।
फैक्ट्री के पड़ोस में चाय की दुकान चलाने वाले रमेश ने बताया कि उसे अब भी यहां काम करने वाली दो महिलाओं की बातें याद आ रही हैं। वह यहां काम करने वाले मजदूरों को 14 दिन से चाय पिला रहा था।
घर जाने के दौरान महिलाएं उससे मजाक करती थीं और कहती थी कि चाय में दूध डाल दिया करो। रमेश ने बताया कि घटना से कुछ देर पहले उसने फैक्ट्री में 41 चाय भेजी थी। उसके मुताबिक वह हर दिन करीब 40 चाय फैक्ट्री में भेजता था।
रज्जो के बेटे लक्ष्मण ने बताया कि रात नौ बजे तक मां के फैक्ट्री से नहीं आने पर वह घर से रवाना हो गया। लेकिन रास्ते में किसी ने बताया कि फैक्ट्री में आग लग गई है।
वहां पहुंचने पर पुलिस वालों ने उसे अस्पताल जाने के लिए कहा, जहां पता चला कि उसकी मां का देहांत हो गया है। मां फैक्ट्री के बेसमेंट में काम करती थी।
उधर, मदीना की बेटी मुबिना ने बताया कि उसके पिता नसरूद्दीन दिमागी रूप से कमजोर हैं। मदीना ही फैक्ट्री में काम करके पूरे परिवार का पालन पोषण करती थी। उसकी मां 15 दिन से इस फैक्ट्री में काम कर रही थी।