दिहाड़ी मजदूर जब कमाता है, तभी घर का चूल्हा जलता है। अगर किसी दिन काम न मिले तो भूखे पेट सोने की नौबत आ जाती है। नोटबंदी की मार झेलते हुए पंद्रह दिन हो गए हैं। ऐसे में अब समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं।
फरीदाबाद में किराये का कमरा लेकर परिवार के पांच सदस्यों का पेट पाल रहे दिहाड़ी मजदूर अच्छेलाल की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। लेबर चौक पर काम के इंतजार में खड़े 50 वर्षीय इस व्यक्ति को रोजाना बिना दिहाड़ी घर लौटना पड़ रहा है। मजदूरी कर जो पैसा कमाया था वो खत्म हो चुका है। अब बासी रोटी खाकर परिवार गुजारा कर रहा है।
शहर में दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाले अच्छेलाल को नोट बंदी क्रियान्वयन की अव्यवस्था ने बेरोजगार कर दिया है। अच्छेलाल ने दबे स्वर में बताया कि बुधवार को जहां काम मिला, उसने भी 500 रुपये का नोट दिखाया।
छह किलोमीटर पैदल चलकर वापस आया हूं। उसके बाद भी बासी रोटी खानी पड़ी। मूलरूप से आगरा के पास सुरैरा के रहने वाले अच्छेलाल कहते हैं, प्रतिदिन मजदूरी की एवज में मिलने वाले कुछ रुपये की चाहत के लिए काम ढूंढता हूं।
पर कुछ काम नहीं मिल रहा है। खुद का पेट ना सही, परिवार का पेट पालना जरूरी है। रोज सुबह घर से उम्मीद के साथ निकलता हूं लेकिन शाम को खाली हाथ घर लौटता हूं तो परिवार की निराशा देखी नहीं जाती।
कहते हैं कि पीएम मोदी को चाय वाला कहकर तंज कसा जाता है, लेकिन नोटबंदी का फैसला मेरे जैसे दिहाड़ी मजदूर पर कितना भारी पड़ेगा, क्या मोदी जी ने यह नहीं सोचा था।