आलम ये है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के ऑटो तक में बैठने से अधिकांश ग्रामीण परहेज कर रहे हैं। उन्हें दूसरा काम भी नहीं मिल रहा है। अघोषित बहिष्कार के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के कई लोगों की जीविका पर संकट आ गया है।
गांव में धार्मिक स्थल निर्माण को लेकर दो समुदायों के बीच संघर्ष हुआ था। जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को चोटें आईं। इस संघर्ष में अल्पसंख्यक समुदाय के घरों में आगजनी व पथराव किया गया।
इस घटना के 15 दिन बीतने के बाद भी अभी तक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। यहां के निवासी उमर मोहम्मद कहते हैं कि पता नहीं यह खाई कब पटेगी।
ना बाल कटवा रहे हैं, ना पानी ले रहे हैं
गांव की तरक्की के लिए खून-पसीने एक कर मेहनत की। लेकिन सब व्यर्थ हो गया। अब गांव वाले उन्हें दुश्मन की नजर से देखते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय का ऑटो चालक कहता है कि अब तो भूखे मरने की नौबत आ रही है।
ऑटो में गांव का कोई आदमी बैठने के लिए तैयार नहीं है। अल्पसंख्यक समुदाय के 22 ऑटो सवारी ढोने का काम करते हैं। संघर्ष में एक ऑटो में आगजनी व दूसरे में पथराव किया गया।
जिसके कारण वह भी क्षतिग्रस्त हैं। बाकी ऑटो ड्राईवरों ने रोड पर सवारी लेने के लिए चलाया, लेकिन गांव का सहयोग नहीं मिल पा रहा है। गांव के लोग न तो उसमें बैठते हैं और न ही किसी और बैठने दे रहे हैं। झगड़े से बचने के लिए कई ऑटो खड़े कर दिए गए हैं।
कैसे बहाल होगा विश्वास?
यहां अल्पसंख्यक समुदाय के कई लोग श्रमिक हैं। वह बुग्गी लेकर काम करते हैं। अब ग्रामीण इन लोगों को काम नहीं दे रहे हैं, जिससे उनके सामने रोजीरोटी का संकट आ गया है।
नाजिर शाह ने बताया कि तनाव के कारण अब गांव वाले काम नहीं देते। पिछले 20 दिनों से काम नहीं मिल रहा है। इसलिए घर पर बैठा हूं। घर चलाना मुश्किल हो गया है। अभी तक सरकार ने मुआवजा भी नहीं दिया।
कई लोग हेयर कटिंग में माहिर हैं। लेकिन, ये कारीगर भी बेरोजगार हो गए। घटना के 10 दिन बाद जब उन्होंने दुकान खोली तो ग्राहकों ने बहिष्कार कर दिया।
अयूब ने बताया कि पूरे दिन दुकान खोलने के बाद भी सौ रूपए की आमदनी नहीं होती। खाली बैठना पड़ रहा है। तनाव के चलते शाहिद अली ने अपनी मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान बंद कर दी है।
वहीं, मुस्ताक का फिल्टर वाला पानी बेचने का काम भी बंद हो गया है। गुलाब अच्छा बिजली का जानकार है, लेकिन वह भी काम की तलाश में है।