एक तरफ उत्तर प्रदेश की प्रमुख सहायक नदियां पांडु और वरुणा नदी गंगा के प्रदूषण बोझ को बढ़ा रही हैं तो दूसरी तरफ गंगा नदी के ज्यादातर क्षेत्र प्रदूषित ही बने हुए हैं। इस वर्ष मानसून से पहले और मानसून के बाद गंगा नदी के कुल 39 चिन्हित स्थानों में सिर्फ हरिद्वार ही एक ऐसा स्थान पाया गया है जहां नदी का पानी साफ रहा। वहीं, मानसून से पहले की अवधि में गंगा नदी के कुल 41 स्थानों में 37 स्थान ऐसे रहे हैं जहां नदी का पानी मध्यम श्रेणी से लेकर गंभीर श्रेणी तक प्रदूषित पाया गया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने गंगा की जैविक पानी गुणवत्ता आकलन रिपोर्ट 2017-18 में यह तथ्य रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद सीपीसीबी ने यह रिपोर्ट सार्वजनिक की है। अध्ययन में पूर्व मानसून और मानसून के बाद गंगा नदी के जल नमूने लेकर उसकी गुणवत्ता काघ विश्लेषण किया गया है। पानी की गुणवत्ता को प्रदर्शित करने के लिए चार श्रेणियां बनाई गई थीं। इसमें दिखाई देने वाला प्रदूषण, मध्यम प्रदूषण, भारी प्रदूषण और गंभीर प्रदूषण शामिल है।
रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व मानसून स्थिति में गंगा के 34 स्थानों में मध्यम प्रदूषण और तीन स्थानों पर गंभीर प्रदूषण पाया गया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख सहायक नदियों में पांडु और वरुणा नदी इसके प्रदूषण को बढ़ा रही हैं। गंगा की मुख्य धारा में किसी भी स्थान पर गंभीर प्रदूषण नहीं पाया गया लेकिन मध्यम श्रेणी वाला प्रदूषण मिला है।
वहीं गंगा से ही जुड़े एक दूसरे 2014-18 की अवधि वाले तुलनात्मक अध्ययन रिपोर्ट में सीपीसीबी ने कहा है कि पूर्व मानसून रामगंगा और गारा नदी में भारी प्रदूषण पाया गया है। वहीं बीते चार वर्षों में इन स्थानों पर प्रदूषण में कोई सुधार नहीं देखा गया है। वहीं, 2017-18 के दौरान उत्तराखंड में जगजीतपुर और यूपी में कानपुर, इलाहाबाद व वाराणसी की गंगा में प्रदूषण 2014-15 से ज्यादा पाया गया है।
2017-18 में सिर्फ हरिद्वार बैराज पर पूर्व मानसून और मानसून के बाद पानी बेहद साफ पाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा में प्रदूषण की रोकथाम के लिए सभी स्थानों पर प्रयासों को तेज करना होगा। कम से कम पानी को बी वर्ग गुणवत्ता श्रेणी वाला पानी बन जाए। बी वर्ग श्रेणी गुणवत्ता पानी का अर्थ है कि जिसमें जलीय जीव आसानी से रह और पनप सकें।