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11 साल की उपलब्धि, एम्स में मोटापे की सर्जरी का आंकड़ा हजार के पार

Thu, 17 Oct 2019 05:49 AM IST
Vikas Kumar परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : फाइल फोटो
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने मोटापे की सर्जरी का आंकड़ा एक हजार के पार पहुंचा दिया है। यह उपलब्धि 11 साल में हासिल हुई है। वर्ष 2008 में शुरू बेरिएट्रिक सर्जरी क्लीनिक में अब तक 1020 मरीजों को पतला किया जा चुका है। इनमें 250 से 300 किलोग्राम तक के रोगी थे। 

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250 किलोग्राम वाले 20 वर्षीय युवक का ऑपरेशन 2017 में हुआ था। इस वर्ष अप्रैल में उसका वजन 120 किलोग्राम हुआ था। इस वर्ष जनवरी से सितंबर तक करीब 150 मोटापाग्रस्त रोगियों ने ऑपरेशन कराया है। डॉक्टरों की मानें तो एम्स में मोटापे की सर्जरी की सफलता दर 80 फीसदी से अधिक है।

एम्स के वरिष्ठ डॉ. संदीप अग्रवाल का कहना है कि मोटापे के ऑपरेशन को लेकर बीते कुछ वर्षों में जागरूकता बढ़ी है। आमतौर पर सभी बड़े अस्पतालों में यह सुविधा है, लेकिन एम्स में करीब 11 वर्ष से हर बृहस्पतिवार को विशेष क्लीनिक संचालित है। 
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डॉ. अग्रवाल का कहना है कि ज्यादातर लोग ऑपरेशन के नाम से ही घबराने लगते हैं, जबकि सच यह है कि मोटापे का ऑपरेशन करने से मरीज की जान बचाई जा सकती है। सर्जरी से इसका उपचार संभव है। 

मोटापे की वजह से रोगी को हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया, कमर में दर्द, सांस फूलना आदि की परेशानी हो सकती हैं। वहीं, एम्स के मेडिसिन विभाग के डॉ. नवल विक्रम का कहना है कि सर्जरी के अलावा मोटापा कम करने के लिए दो तरह की दवाएं भी उपलब्ध हैं। इनका सेवन रोगी को जीवन पर्यंत करना पड़ सकता है।
 

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एम्स की सुविधाएं

ओपीडी : हर बृहस्पतिवार
समय : दोपहर 2 बजे
स्थान : सर्जरी ओपीडी, 5वी मंजिल, कमरा नंबर 10
इंचार्ज : डॉ. संदीप अग्रवाल
वेटिंग : 4 से 6 सप्ताह
सर्जरी : बीएमआई 35 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर से ऊपर हो। 

अध्ययन : निजी स्कूलों के बच्चे होते हैं ज्यादा मोटे
एम्स के एंडोक्रायनोलॉजी विभाग के डॉ. राजेश के अनुसार, सरकारी की तुलना में निजी स्कूलों के बच्चे सबसे ज्यादा मोटापाग्रस्त मिले हैं। दिल्ली के सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ रहे करीब 25 हजार बच्चों पर डॉक्टरों ने अध्ययन किया है। 

इसके मुताबिक, सरकारी स्कूलों के बच्चों को आने-जाने के लिए बस और स्कूल में कैंटीन की सुविधा न मिलने के कारण वे जंकफूड से दूर रहते हैं। साथ ही, स्कूल आने-जाने में उनका शारीरिक श्रम भी होता है। निजी स्कूलों के बच्चे ज्यादा जंकफूड ले रहे हैं। साथ ही, घर से ही उन्हें गाड़ी या बस में स्कूल लेकर जाने से शारीरिक श्रम भी नहीं हो पा रहा है।
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