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Noida News: कम हो रहा कचरे का बोझ, बढ़ रहा पर्यावरण संरक्षण

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(नोट- प्लांट की और बातचीत की फोटो है)
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कम हो रहा कचरे का बोझ, बढ़ रहा पर्यावरण संरक्षण
हाईराइज सोसाइटियों में हो रहा गीले कचरे का निस्तारण, बनाई जा रही खाद

सोसाइटियों के अंदर ही लगाए जा रहे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट

वान्या दीक्षित
नोएडा। हाईराइज सोसाइटियों में कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती बनता जा रहा था लेकिन शहर की बड़ी सोसाइटियों ने इस समस्या का शानदार और आत्मनिर्भर समाधान ढूंढ निकाला है। सोसाइटियों के अंदर ही लगाए जा रहे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट अब पर्यावरण बचाने के साथ ही शहर में कचरे का बोझ भी कम कर रहे हैं।
कई हाईराइज सोसाइटियों ने अपने यहां गीले कचरे का निस्तारण करने के लिए आधुनिक ऑर्गेनिक वेस्ट कनवर्टर (ओडब्ल्यूसी) मशीनें लगाई हैं। बतादें कि इन मशीनों से हाईराइज सोसाइटी के घरों से निकलने वाले गीले कचरे का निस्तारण भी सोसाइटी के अंदर ही किया जा रहा है। ऐसे में गीला कचरा बाहर नोएडा प्राधिकरण की ओर से आने वाली गाड़ियों में भी नहीं जाता। गीले कचरे से बनने वाली खाद सोसाइटी के अंदर लगे पड़े पौधों में डाली जाती है। गीले कचरे में ऐसी सामग्री होती है जो आमतौर पर नम या गीली होती है और प्राकृतिक रूप से सड़ सकती है। गीले कचरे में खाद्य अपशिष्ट, रसोई अपशिष्ट, सब्जियों के छिलके, फलों के छिलके आदि होते हैं। इनका निस्तारण समय पर न किया जाए तो इनसे दुर्गंध भरा द्रव्य निकलने लगता है और सड़न हो जाती है।
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हर सप्ताह बनती है 30 किलोग्राम खाद
होम्स 121 सोसाइटी के एओए सचिव निमित अग्रवाल ने बताया कि सोसाइटी के अंदर कंपोज्ड मशीन लगी है। इसमें हर सप्ताह करीब 300 किलो गीले कचरे का निस्तारण किया जाता है। जिसमें सप्ताह में करीब 30 किलो खाद बन रही है। गीले कचरे में पानी की मात्रा भी होती है। कंपोज्ड मशीन में डालने पर गीले कचरे से काफी मात्रा में पानी निकलता है। इस पानी को सुखाने के लिए पेड़ों की सूखी पत्तियों और लकड़ी का बुरादा इस्तेमाल करते हैं।
बिना ऑक्सीजन एनारोबिक प्रक्रिया से चलता है प्लांट

सेक्टर-107 स्थित प्रतीक एडिफिस एओए सदस्य प्रतिभा खान ने बताया कि गीले कचरे के निस्तारण के लिए सोसाइटी के अंदर छह एरोबिंस लगाए गए हैं। रोजाना करीब 90 किलो गीला कचरा डाल सकते हैं। गीले कचरे को एरोबिंस में डालने के साथ ही कम मात्रा में कोकोपीट भी डाला जाता है। गीला कचरा और उसके ऊपर कोकोपीट डालकर कई लेयर बनती हैं। एरोबिंस बिजली के बिना चलते हैं। इसमें पहली प्रक्रिया में खाद बनने में 45 से 50 दिन का समय लगता है। इसके बाद से यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और हर 40 दिन में नई खाद मिल जाती है।
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25 एकड़ की हरियाली को मिलती है खाद
सेक्टर-78 स्थित महागुन मॉर्डन सोसाइटी निवासी विनोद कुमार शर्मा ने बताया कि यहां पर 1500 किलोग्राम की क्षमता वाली ओडब्ल्यूसी मशीन लगी है। इसमें रोजाना 1000 से 1100 किलोग्राम गीले कचरे का निस्तारण होता है और रोजाना करीब 20 से 25 प्रतिशत खाद निकलती है। यह प्लांट बिजली से चलता है। इसमें एक बार गीला कचरा डालने पर 24 घंटे में ऑटोमेटिक प्रक्रिया पूरी हो जाती है और फिर मशीन खुद ही बंद हो जाती है। सोसाइटी की 25 एकड़ में लगी फुलवारी में इसी खाद का इस्तेमाल होता है।
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