ग्रेनो में रह रहे उत्तराखंड के लोगों ने रखी अपनी बात, कहा-घर जाने के लिए पहले नोएडा या दिल्ली जाना पड़ता है
04 हजार परिवार रहते हैं ग्रेनो में उत्तराखंड के
संवाद न्यूज एजेंसी
ग्रेटर नोएडा। शहर में उत्तराखंड भवन नहीं हैं। ऐसे में पहाड़ के लोगों को सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के लिए भटकना पड़ता है। उत्तराखंड भवन के लिए जमीन की मांग का पत्र ग्रेनो प्राधिकरण को लिखा गया है लेकिन अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। जमीन उपलब्ध करा दी जाए तो जरूरी भुगतान भी उत्तराखंड समाज करने के लिए तैयार है। ये बातें शनिवार को ग्रेटर नोएडा के सेक्टर गामा-1 स्थित सामुदायिक केंद्र में आयोजित अमर उजाला कम्युनिटी संवाद कार्यक्रम में उत्तराखंड समाज के लोगों ने कहीं।
उन्होंने कहा कि भवन निर्माण के लिए समाज ने धनराशि की व्यवस्था कर ली है। यदि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की ओर से जमीन आवंटित होती है तो जल्द क्लब का निर्माण कराया जा सकता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये विलुप्त हो रही भाषा को भी बचाया जा सकता है। शहर में चार हजार से अधिक परिवार उत्तराखंड से आकर यहां रह रहे हैं।
एसके जोशी ने बताया कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए सामुदायिक केंद्र तक की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में दूसरी जगह जाना पड़ता है। शहर में उत्तराखंडी मंदिर नहीं हैं। हेमचंद पांडे ने बताया कि उत्तराखंड के लोग समय-समय पर हरेला, फूल देई, घुघुतिया, कुमाऊंनी होली, लोकगीत, लोकनृत्य, रामलीला, होली गायन और अन्य पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ग्रेनो में भवन नहीं मिलने से कई बार कार्यक्रम रद्द करने पड़ते हैं।
लोगों ने कहा कि शहर में घाट की व्यवस्था नहीं हैं जबकि किसी परिवार में मृत्यु होने पर 12 दिनों तक विशेष कार्यक्रम के लिए पानी की जरूरत होती है। इसके लिए भी कई बार ग्रेनो प्राधिकरण से मांग की जा चुकी हैं। सीधी परिवहन सेवा के अभाव के कारण लोगों को ग्रेनो से उत्तराखंड जाने के लिए दिल्ली या नोएडा जाना पड़ता है। इसमें दो से तीन घंटे बर्बाद होते हैं।
ग्रेनो व उत्तराखंड आवागमन के लिए यहां से परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं है। दिल्ली व नोएडा से बस मिलती हैं। -जेपी एस रावत
उत्तराखंड भवन नहीं होने से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भटकना पड़ता हैं। प्रशासन से अनुमति लेनी होती है। -सतेंद्र सिंह नेगी
यहां पर उत्तराखंड के पारंपरिक मंदिर नहीं हैं। ऐसे में पूजा-अर्चना के लिए दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। -तारा दत्त शर्मा
ग्रेनो में दाहसंस्कार के लिए घाट नहीं है। मृत्यु के बाद 12 दिन तक विशेष कार्यक्रमों के लिए पानी की जरूरत होती है। -दिनेश रावत
विभिन्न सेक्टरों की सड़कें जर्जर हैं। वाहन खराब हो रहे हैं और लावारिस कुत्ते लोगों के लिए परेशानी का सबब बने हैं। -जगमोहन सिंह रावत
उत्तराखंड भवन की व्यवस्था होने पर नई पीढ़ी को उत्तराखंड की भाषा से अवगत कराने के लिए क्लास चला सकते हैं। -दिनेश पंवार
सिटी बसों की सुविधा न होने से परी चौक तक जाने के ऑटो व कैब चालक मनचाहा किराया वसूलते हैं। -आजाद मोहन पवार
जगत फार्म, अल्फा दो, रामपुर आदि मार्केट में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। सड़क पर वाहन खड़ा करना पड़ता है। -सुबोध कुमार नेगी
गर्मी आते ही सेक्टरों में चोरी की वारदात शुरू हो जाती हैं। इस पर रोक लगाने के लिए प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। -त्रिलोक सिंह पवार
कोई व्यक्ति परी चौक से किसी सेक्टर में आता है तो ऑटो चालक दो से तीन किमी दूरी के लिए भी 200 से 300 वसूलते हैं। -दिलीप सिंह नेगी
संवाद ----- सुबोध कुमार नेगी । अमर उजाला
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