लाभांश राशि दिलाने के लिए दायर वाद को उपभोक्ता किया खारिज
संवाद न्यूज एजेंसी
ग्रेटर नोएडा। गलत बयानबाजी और गलत राशि छपने पर बीमा पॉलिसी की शर्तो और नियमों से अधिक लाभ नहीं दिया जा सकता है। ऐसे ही एक मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने पॉलिसी में तीन साल में मिलने वाले लाभांश राशि दिलाने के लिए दायर वाद को खारिज कर दिया। आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार पुंडीर और सदस्य अंजु शर्मा ने सुनवाई की।
ग्रेनो वेस्ट निवासी गिरेंद्र रे ने रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से 29 जनवरी 2011 को रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कैश फ्लो प्लान पॉलिसी खरीदी थी। बीमित राशि 6,25,230 थी जिसकी पॉलिसी अवधि और प्रीमियम अवधि 22 वर्ष थी। इसे हर साल 39,999 का भुगतान करना था। उपभोक्ता को आश्वासन दिया गया था कि 1,56,307 का उत्तरजीविता लाभ हर तीसरी साल पर देय होगा। साथ ही निहित बोनस, मृत्यु लाभ और दुर्घटना राइडर कवरेज भी मिलेगा। कंपनी के प्रतिनिधि की बातों का भरोसा करके उन्होंने पॉलिसी के लिए सहमति दे दी।
उपभोक्ता का कहना है कि जनवरी 2015 में पहले उत्तरजीविता लाभ की परिपक्वता पर वायदा किए गए 1,56,307 के बजाय केवल 89,318 रुपये मिले। 24 फरवरी 2015 को एक पत्र के माध्यम से उनके तत्काल विरोध किया। विरोध करने पर कंपनी ने उत्तर दिया कि मूल पॉलिसी दस्तावेज गलती से मुद्रित हो गया था और एक संशोधित प्रति जारी की जाएगी। हालांकि, कोई संशोधित प्रति कभी प्राप्त नहीं हुई, और जनवरी 2018 में फिर से, शिकायतकर्ता को भुगतान किया गया वहीं घटी हुई राशि 89,318 उनको मिली। उनका विरोध करने पर फिर से बीमा कंपनी ने कोई सुधारात्मक कार्रवाई किए बिना, इसी तरह के जवाबों से दरकिनार कर दिया।
परेशान होकर उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत की। कंपनी का कहना है कि पॉलिसी के तहत सही उत्तरजीविता लाभ 89,318 था जो हर तीसरे वर्ष देय था न कि 1,56,307 जैसा कि पहले गलती से छपा था। शिकायतकर्ता को सही भुगतान के बारे में सूचित किया गया था और पॉलिसी अनुसूची में गलत छपाई कोई नया संविदात्मक दायित्व नहीं बना सकती। आयोग ने माना कि बीमा अनुबंध की शर्तों की सख्ती से व्याख्या की जानी चाहिए और कथित मौखिक आश्वासनों के माध्यम से उन्हें बदला नहीं जा सकता। केवल मुद्रण त्रुटि, संशोधित अनुसूची के तहत निर्धारित सीमा से परे कोई अधिकार नहीं बना सकती। शिकायत में कोई सार नहीं है और ऐसा प्रतीत होता है कि यह अनुबंध के तहत देय लाभों से अधिक लाभ का दावा करने का प्रयास है। आयोग ने शिकायत को खारिज कर दिया।