-तुलसी और भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम का विवाह पारंपरिक रीति से होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाया जाने वाला तुलसी विवाह पर्व आज पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। राजधानी में महिलाओं ने सुबह से ही पूजा की तैयारियां शुरू कर दी। मंदिरों, कॉलोनियों और घरों में तुलसी और भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम का विवाह पारंपरिक रीति से संपन्न किया जाएगा।
शनिवार को बाजारों में पूजा सामग्री की खरीदारी को लेकर जबरदस्त भीड़ रही। चांदनी चौक, लाजपत नगर, तिलक नगर और उत्तम नगर के बाजारों में तुलसी विवाह से जुड़ी वस्तुओं मालाएं, कलश, नारियल, चुनरी, धूप-बत्ती, मिठाई और पूजा के दीपों की मांग बढ़ गई। महिलाएं सजावटी तुलसी चौरा, मिट्टी के दीपक और सजावट की वस्तुएं खरीदती नजर आईं।
पूजा-विधि और नियम
पूजा के दौरान तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। उस पर लाल चुनरी और गहने पहनाए जाते हैं। भगवान विष्णु या शालिग्राम की प्रतिमा को दूल्हे के रूप में स्थापित किया जाता है। तुलसी और विष्णु के मिलन के बाद आरती, भजन और प्रसाद वितरण किया जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन कथा सुनती हैं और शाम को दीपदान करती हैं।
मंदिरों में हुए कार्यक्रम
राजधानी के मंदिरों में भी आज तुलसी विवाह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। श्रद्धालु सुबह से ही पूजा-अर्चना में जुटे हैं। भक्तों का कहना है कि यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि घर-परिवार में पवित्रता और एकता का संदेश भी देता है।
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पौराणिक मान्यता
हिंदू धर्म में तुलसी विवाह का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन तुलसी जी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से होता है। यह पर्व देवउठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है और इसके साथ ही चातुर्मास की समाप्ति होती है। माना जाता है कि इस दिन से विवाह और शुभ कार्यों की शुरुआत फिर से की जा सकती है
वर्जन
हर साल तुलसी विवाह पूरे उत्साह से करती हूं। मान्यता है कि इस दिन तुलसी और भगवान विष्णु का विवाह कराने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। यह पर्व परिवार को एक साथ जोड़ता है।
- अंजली पटेल, लाजपत नगर
तुलसी विवाह महिलाओं के लिए बहुत भावनात्मक दिन होता है। हम तुलसी माता को दुल्हन की तरह सजाते हैं और पूरे रीति-रिवाज से पूजा करते हैं। ऐसा करने से जीवन में अच्छे संस्कार और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
- काव्या कंठ, वंसत कुंज