-अस्पताल में लंबे समय से दवाओं का अभाव, मरीजों को भुगतनी पड़ रहीं हैं परेशानियां
-अस्पताल के आसरे है 17 लाख की आबादी, बाहर से दवाएं खरीदने पर मजबूर हैं मरीज
-पड़ रहा है जेब पर सीधा असर, तमाम शिकायतों के बावजूद अस्पताल प्रशासन बेपरवाह
संवाद न्यूज एजेंसी
नूंह। जिले की करीब 17 लाख आबादी के लिए जीवनरेखा माने जाने वाला जिला नागरिक अस्पताल मांडीखेड़ा इन दिनों व्यवस्थाओं के मामले में खुद बीमार नज़र आ रहा है। जिस अस्पताल से गरीब, मज़दूर और ग्रामीण परिवारों को राहत मिलनी चाहिए, वहीं आज मरीज दवाओं के लिए भटकने, जांच के लिए दर-दर ठोकरें खाने और इलाज के नाम पर जेब खाली करने को मजबूर हैं। बुधवार को की गई पड़ताल में जो तस्वीर सामने आई, वह सिस्टम की संवेदनहीनता और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई बयां करती है।
- फार्मेसी के बाहर लगी मायूसी की कतार
अस्पताल की ओपीडी में डॉक्टर मरीजों को पर्ची तो थमा रहे हैं, लेकिन फार्मेसी काउंटर पर पहुंचते ही कई जरूरी दवाइयां “स्टॉक में नहीं हैं” कहकर बाहर से लेने को कहा जा रहा है। कहीं गोलियां तो मिल जाती हैं, लेकिन सिरप, आई ड्रॉप, एंटीबायोटिक और जरूरी इंजेक्शन बाहर से मंगाने पड़ रहे हैं। दवा लेने के लिए इधर-उधर भटकते मरीज और उनके परिजन अस्पताल परिसर में आम दृश्य बन गए हैं।
- सफाई व्यवस्था भी बेहाल
दवाइयों की कमी के साथ-साथ सफाई व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। कई वार्डों और गलियारों में गंदगी फैली नजर आई। शौचालयों की स्थिति बदतर है, जिससे मरीजों और उनके तीमारदारों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
- जांच के नाम पर भटकाव, बीमारी बढ़ने का खतरा
मरीजों की परेशानी सिर्फ दवाइयों तक सीमित नहीं है। अस्पताल में टीबी जैसी गंभीर बीमारी की जांच तक नहीं हो पा रही। कई मरीजों को एक्स-रे और अन्य जरूरी जांचों के लिए बाहर भेजा जा रहा है। मरीजों का कहना है कि एक जांच के लिए अलग-अलग जगह भेजा जाता है, जिससे समय भी बर्बाद होता है और बीमारी बढ़ने का खतरा भी। सवाल यह है कि जब जिला अस्पताल में ही बुनियादी जांचें उपलब्ध नहीं हैं, तो दूर-दराज से आने वाले मरीजों का क्या होगा?
सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था
यह पहली बार नहीं है जब जिला नागरिक अस्पताल अनियमितताओं को लेकर सुर्खियों में आया हो। इससे पहले भी स्टाफ की कमी, अव्यवस्थाएं और लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं। बावजूद इसके हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार मुफ्त और सुलभ इलाज के दावे कर रही है, तो फिर दवाइयों का टोटा क्यों? आखिर कब तक गरीब मरीज अपनी जेब काटकर इलाज कराने को मजबूर रहेंगे?
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बोले मरीज
“मेरे बेटे की तबियत अचानक खराब हो गई थी। सोचा सरकारी अस्पताल में इलाज हो जाएगा। डॉक्टर ने दवाइयां लिख दी, लेकिन फार्मेसी से सिर्फ कुछ गोलियां मिली। बाकी दवाइयां बाहर से खरीदने को कहा गया। गरीब आदमी कहां से लाए इतना पैसा।
आमिर, जलालपुर।
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मैं अपने परिचित की आंखों की जांच कराने आया था। हैरानी की बात है कि छोटी-छोटी दवाइयां तक बाहर से मंगानी पड़ रही हैं। जो लोग रोज कमाकर खाते हैं, उनके लिए यह बहुत बड़ी परेशानी है।
हुसैन, नावली।
फार्मेसी से गोलियां तो दे दी गईं, लेकिन सिरप बाहर से लेने के लिए कहा गया। अगर हर चीज बाहर से ही खरीदनी है तो फिर सरकारी अस्पताल का क्या फायदा।
मुस्तकीम, कैथवाड़ा।
मैं बुजुर्ग मां को लेकर आई हूं। पहले ही सफर में खर्च हो गया, ऊपर से दवाइयों के पैसे अलग। अस्पताल में सफाई भी ठीक नहीं है।
हारुनी, नसीरबास।
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वर्जन
अस्पताल में ज्यादातर दवाइयां उपलब्ध हैं। अगर कोई बाहर से दवाइयां खरीदने के लिए लिख रहा है या बाहर से दवाइयां खरीदने के लिए बोल रहा है। उसकी जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने पर निश्चित तौर पर कार्रवाई की जाएगी।
विशाल सिंगला, सीनियर डॉक्टर जिला अस्पताल मांडीखेड़ा।
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