नोएडा (योगेश शर्मा)। रुपहले पर्दे पर खुद की जिंदगी से जुड़ी सच्ची और दर्द भरी कहानी दिखाई जा रही हो तो आंखें नम होना स्वाभाविक है। रविवार दोपहर सेक्टर-18 के एक सिनेमाघर में ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म का स्पेशल शो देखने पहुंचे कश्मीरी पंडित पर्दे पर विस्थापन का दर्द देखकर इतने भावुक हो गए कि तीन दशक पुराने उस मंजर को याद कर आंसू बहाने लगे। फिल्म में कश्मीरी पंडितों के पलायन को दिखाया गया है। स्थानीय सांसद डॉ. महेश शर्मा ने भी विस्थापितों के साथ फिल्म को देखा। फिल्म देखने के बाद दर्शकों ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के दर्द और पीड़ा पर कई कहानियां पढ़ीं हैं, लेकिन यह फिल्म अलग स्तर की है जिसने कश्मीरी पंडितों के दर्द को लोगों के सामने लाने का काम किया है। वहीं, फिल्म देखने आईं श्वेता काचरू ने नम आंखों से बताया कि ये फिल्म नहीं, बल्कि 32 साल पुरानी वह सच्चाई है जो कश्मीरी पंडितों के दर्द को बयां करती है। नरसंहार के बाद लाखों लोगों को जान बचाने के लिए घर छोड़ना पड़ा और भगोड़ा तक कहकर आवाज को दबाया गया, लेकिन इस फिल्म के माध्यम से सच देश के सामने आया है। उम्मीद है बदलाव भी जरूर आएगा।
हम भगोड़े नहीं, आवाज दबाई गई
कश्मीर में जो हमारे और बुजुर्गों के साथ हुआ, हम अपने बच्चों के सामने उस दर्द बयां नहीं कर पा रहे थे। इसे फिल्म ने बखूबी पेश किया है। जब कश्मीर में नरसंहार हुआ हम दक्षिण भारत में थे। मोबाइल फोन का जमाना नहीं था, इसलिए कोई खबर भी नहीं मिल रही थी, लेकिन जम्मू पहुंचे तो भीड़ देखकर हैरानी में पड़ गए। लोग खाने तक के लिए तरस रहे थे। - श्वेता काचरू
आज भी डराता है वो खौफनाक मंजर
32 साल पहले कश्मीर में जो हुआ वो फिल्म के जरिये बखूबी दिखाया गया है। मैं खुद ही नही, बल्कि दो बच्चे भी कश्मीर की घटना के गवाह हैं। जनवरी 1990 की आधी रात को हमें घर छोड़कर निकलना पड़ा। उसके बाद आज तक पुश्तैनी घर को नहीं देखा। हम वहां जाना चाहते हैं, लेकिन नरसंहार का वह मंजर आज भी डराता है। - वीरेंद्र भान
देखते ही देखते बिखर गया संयुक्त परिवार
उम्मीद थी कि महीने दो महीने में वापस लौट जाएंगे, लेकिन तीन दशक हो गए हैं, वापस लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। संयुक्त परिवार बिखर गया जिसकी यादें आज भी सोने नहीं देतीं। फिल्म देखकर यादें ताजा हो गईं, आंखों से आंसू रोक नहीं पा रहा हूं। आज तक समझ नहीं पाया कि हमें हमारे ही घर से क्यों बाहर निकाल दिया गया। - बिहारी लाल
हमें न्याय कहां मिलेगा, कुछ पता नहीं
नौकर ने धोखा देकर आतंकियों को हमारी खबर पहुंचा दी थी, लेकिन इससे पहले ही मेरे पिता और अंकल ने परिवार को कश्मीर से निकाल दिया। बदकिस्मती से पिता और अंकल नहीं आ पाए। उन्हें आतंकियों ने मार दिया और तारों से पेड़ पर लटकाकर शरीर में कई छेद कर दिए। मेरे पास एफआईआर की कॉपी है, लेकिन न्याय कहां मिलेगा कुछ पता नहीं। - रविंद्र पंडिता
माइग्रेंट कहलाना हमें अच्छा नहीं लगता
हमने अपनी आंखों से खौफनाक मंजर देखा है। फिल्म में जो दिखाया गया वह पूरी तरह सच है, लेकिन इससे आगे भी कई और सच हैं। जो अपने आप को धर्मनिरपेक्ष बोलते हैं, यह फिल्म उनके मुंह पर तमाचा है। अपनी व्यथा बताने पर कोई मजाक बनाता था तो कोई भागा हुआ बताता था। माइग्रेंट कहलाना हमें अच्छा नहीं लगता। - रीता
फिल्म तो सिर्फ एक घटना पर आधारित है, ऐसी कई घटनाएं तीन दशक पहले कश्मीर में हुई थीं। साल बीत गए, लेकिन हम और हमारे बड़े-बुजुर्गों के जहन से वह दर्दनाक मंजर मिटने का नाम नहीं लेता। जिन लोगों ने बच्चों और औरतों को बेरहमी से मारा वे अभी भी खुलेआम घूम रहे हैं। ऐसे लोगों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। - विजय काचरू
फिल्म देखी तो पता चला कि घर के बड़ों ने जो बताया वह सच था। दादा जी अब तक कश्मीर की घटना को भुला नहीं पाए हैं। नींद के लिए आज तक गोलियां लेनी पड़ती हैं। किताबों में हमें दूसरे विश्व युद्ध और हिटलर के बारे में सब कुछ पढ़ाया गया, लेकिन हमारे देश में जो घटना हुई उसके बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं है। - सोहम