-ट्रांसपोर्टेशन से लेकर घर के खर्चों तक में आ सकती है महंगाई
-आयात ज्यादा, निर्यात कम और बढ़ा रहा है दबाव
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 90 रुपए तक पहुंच गया है। यानी 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 90 रुपये से भी ज्यादा हो गई है। बैंकों के उच्च स्तर पर अमेरिकी डॉलर की खरीद जारी रखने और विदेशी पूंजी की निकासी से रुपये पर दबाव बढ़ाया है। ऐसी स्थिति का सबसे ज्यादा नुकसान व्यापारियों व आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
उत्तरप्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के चेयरमैन नरेश कुच्छल ने एक वक्तव्य में कहा कि निर्यात, विदेशी निवेश, एनआरआई की रेमिटेंस वगैरह के जरिये अगर भारत में ज्यादा डॉलर आते हैं, तो रुपया मजबूत होता है। इसकी उलट स्थिति यानी ज्यादा आयात, विदेशी निवेशकों का भारतीय कंपनियों से निवेश वापस खींचने जैसी स्थितियों में रुपया कमजोर होता है। उन्होंने कहा, ट्रेडर्स की निगाहें रुपये में स्थिरता के संकेतों और भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर स्पष्टता पर बनी हुई हैं, जिससे मार्केट का मूड तनावपूर्ण बना हुआ है। रुपया और डॉलर का रेट तय होने का भी एक बाजार है, जिसे फॉरेक्स मार्केट कहते हैं।
यहां बैंक, बड़ी कंपनियां और निवेशक डॉलर खरीदते‑बेचते हैं। जब डॉलर की मांग ज्यादा होती है और बाजार में डॉलर कम मिलते हैं, तो डॉलर महंगा और रुपया सस्ता हो जाता है। अध्यक्ष रामावतार सिंह ने बताया कि भारत पेट्रोल‑डीजल और रसोई के तेल से लेकर मोबाइल, टीवी, मशीनरी जैसे सामानों और बहुत कुछ का आयात आयात करता है रुपया कमजोर होते ही इन्हें खरीदने के लिए ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं, इसलिए पेट्रोल‑डीजल, गैस, हवाई टिकट, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंपोर्टेड दवाएं और गाड़ियां महंगी होने लगती हैं। इसका सीधा असर व्यापारियों व उपभोक्ताओं पर पड़ती है।
कोट
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जब ईंधन महंगा होता है तो जाहिर है कि ट्रक‑ट्रांसपोर्ट का किराया बढ़ता है और फिर उसका असर सब्जी, अनाज, दूध, पैकेज्ड फूड जैसी रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजों की कीमत पर भी पड़ता है।
- मनोज भाटी, व्यापारी
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निर्यात, विदेशी निवेश के जरिए अगर भारत में ज्यादा डॉलर आते हैं, तो रुपया मजबूत होता है। इसकी उलट स्थिति यानी ज्यादा आयात, विदेशी निवेशकों का भारतीय कंपनियों से निवेश वापस खींचने जैसी स्थितियों में रुपया कमजोर होता है।
-नरेश कुच्छल, चेयरमैन, उत्तरप्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल
भारत ज्यादा आयात करे और निर्यात कम हो, तो हमें डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ता है, मांग बढ़ती है और रुपया टूटता है।
- रामावतार सिंह, व्यापारी