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बंदिशों को तोड़ता प्यार, सवाल बेशुमार: लिव-इन रिश्तों पर लोगों की राय जुदा, पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क

Tue, 22 Nov 2022 08:10 AM IST
शाहरुख खान प्रगति मिश्रा, अमर उजाला, नोएडा

सार

समाजशास्त्री डॉ. अनीता मिश्रा कहती हैं कि तेजी से बदलते समाज में रिश्तों का स्वरूप बदलना लाजमी है। बदलाव निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समाज कभी उदारवादी सोच की ओर अधिक झुकाव दिखाता है तो कभी दूसरी ओर। 
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली में श्रद्धा हत्याकांड के बाद नोएडा सहित दिल्ली-एनसीआर में कई सामाजिक संगठन लिव-इन रिश्तों पर रोक की मांग कर रहे हैं। वहीं हाल ही में टीवी टॉक शो के दौरान जया बच्चन ने अपनी नातिन नव्या से कहा कि बिना शादी उनके गर्भवती होने में कोई परेशानी नहीं है। इन दोनों घटनाओं ने लिव-इन (सहमति संबंध) रिश्तों पर एक नई बहस छेड़ दी है। शहर में कुछ लोग इसके पक्ष में हैं वहीं कई विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं।
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समाजशास्त्री डॉ. अनीता मिश्रा कहती हैं कि तेजी से बदलते समाज में रिश्तों का स्वरूप बदलना लाजमी है। बदलाव निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समाज कभी उदारवादी सोच की ओर अधिक झुकाव दिखाता है तो कभी दूसरी ओर। समाजशास्त्री इसे पश्चिमी सभ्यता का असर या आधुनिकता का दुष्प्रभाव नहीं मानते। बल्कि इसे अनवरत प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं। व

ह कहती हैं कि आजकल माता-पिता का नियंत्रण उदार हो रहा है। एक उम्र के बाद बच्चे अपने निर्णय स्वयं लेने को प्राथमिकता देते हैं। कई बार अभिभावकों को उनके निर्णय की जानकारी भी देर से होती है। वहीं सामाजिक वर्जना का डर भी कम हो रहा है जिसने बदलाव की राह दिखाई है। हालांकि वह यह भी मानती हैं कि हर बदलाव के पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं।
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प्यार में विवाद बिगाड़ देता है हालात
लिव-इन रिश्तों पर सबसे ज्यादा बहस तब छिड़ती है जब कोई विवादित मामला सामने आता है। महिला थाना प्रभारी शैली राणा कहती हैं कि लिव-इन मामलों के बाद जो विवाद सामने आते हैं, उनका हल निकलना मुश्किल होता है। शादीशुदा जोड़ों में झगड़ों के बाद मध्यस्थता, अलगाव आदि को लेकर स्पष्ट नियम हैं। लेकिन लिव-इन नया कल्चर है। इसको लेकर कोई स्पष्ट नियम नहीं है। 

कई बार लंबे समय से साथ रह रहे जोड़े अलग होने पर एक दूसरे पर गंभीर आरोप लगाते हैं। हर माह स्थानीय थानों में ऐसे कई मामले सामने आते हैं। कौन सही कह रहा और किसके आरोप झूठे हैं यह कहना मुश्किल हो जाता है। पति-पत्नी की तरह लंबा वक्त बिता चुके जोड़े जब अलग होने पर रेप, प्रताड़ना जैसे आरोप लगाते हैं तो उसकी सच्चाई तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

उठ रहे सवाल, जवाब भी हैं मौजूद
श्रद्धा हत्याकांड के बाद नोएडा में लव जिहाद विरोधी रैली निकालने वाले बजरंग दल के श्रद्धानंद प्रखंड उपाध्यक्ष बलकेश कुमार कहते हैं कि जिहादी या अपराधी मानसिकता के लोग जान बूझ कर लड़कियों को गलत सूचनाएं देकर प्यार के जाल में फंसाते हैं। लड़कियां आधुनिकता की चकाचौंध में धर्म को किनारे रखकर इनके चक्कर में फंस जाती है। 

मां-बाप को खबर नहीं लगती कि उनके बच्चे किस रास्ते पर चल रहे हैं। वह कहते हैं कि हमें अपनी बहन बेटियों को भी सजग करना होगा ताकि दूसरी कोई श्रद्धा किसी और घर में ना हो। वहीं सेक्टर-62 की एक आईटी कंपनी में कार्यरत अवंतिका (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि मैं लिव-इन रिश्ते में पांच साल से रह रही हूं और मुझे नहीं लगता कि कुछ भी गलत किया है। अपने जीवन के फैसले लेने का पूरा हक मुझे है। उनकी बड़ी बहन ने अरेंज मैरिज की थी। 

शादी के कुछ ही महीनों बाद बहन के पति व ससुराल वालों ने दहेज के लिए पीटना शुरू कर दिया। दो बेटियों के जन्म होने पर उन्हें छोड़ दिया। वह कहती हैं कि श्रद्धा जैसे लिव-इन रिश्तों के बुरे परिणामों का उदाहरण देने वाले बड़ी चालाकी से दहेज हत्या, मैरिटल रेप व औरतों के साथ होने वाले अन्य अत्याचारों को अनदेखा कर देते हैं। लड़कियों को उनके अपने फैसले लेने से रोकने के लिए यह समाज हमेशा कई बहाने गढ़ता आया है।
 

दलीलें कई, कौन बताएं क्या है सही

सेक्टर-11 निवासी अंजना भागी कहती हैं कि उनके सेक्टर में लिव-इन जोड़ों की तादाद बढ़ रही है। ऐसे लोगों से माहौल खराब होता है। इन्हें ना संस्कृति, सभ्यता की परवाह है ना ही मान मर्यादा की। इन पर रोक लगनी चाहिए। वहीं सेक्टर-93 की एक हाईराइज बिल्डिंग में रहने वाली अंकिता (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि दो साल पहले मैंने साथी के साथ एक घर में रहने का फैसला किया। तब सबसे पहली चुनौती तो घरवालों का गुस्सा झेलने की थी। 

दूसरी सबसे बड़ी समस्या बिना शादी के घर लेने की आई। लोग बिना शादी के जोड़ों को घर नहीं देना चाहते हैं, कोई देने को तैयार हो तो पड़ोसी हंगामा काटते रहते हैं। ऐसे में ज्यादातर लिव-इन जोड़ों को अपने रिश्ते का सच छुपाना ही पड़ता है। लेकिन क्या हमें हमारे हिस्से की गलतियां करने का भी हक नहीं है। मां-बाप की पसंद गलत निकले तो लड़की का भाग्य लेकिन लड़की का फैसला गलत हो जाए तो हर किसी को सुनाने का हक कैसे मिल सकता है। 

सेक्टर-62 में रह रही सपना ( बदला हुआ नाम) कहती हैं कि मुझे मेरे लिव-इन साथी से भावनात्मक व आर्थिक सहयोग मिलता है। साथ रहना हम दोनों को पसंद है और हम दोनों ही इतनी जल्दी शादी नहीं करना चाहते तो कोई और क्यों हमारे रिश्ते का फैसला करे। हम वही कर रहे हैं जो हमें सही लगता है।

कानून सबके लिए , समझे अपराध व सहमति का फर्क
कुछ समय पहले ममूरा में महिला पर तेजाब डालने का मामला हो या सेक्टर-62 कि एक निजी कंपनी में काम करने वाली महिला से मारपीट का। शहर में हाल के कुछ महीनों में महिला अपराधों से जुड़े कई ऐसे मामले आए जिनमें महिलाएं लिव-इन रिश्तों में रह रही थी। वहीं पिछले साल से अब तक रेप के आधे से अधिक मामलों में महिलाओं ने लिव-इन पार्टनर पर आरोप लगाएं हैं। 
 
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ऐसे मामले भी लिव इन रिश्तों पर सवाल उठाते हैं। महिला सुरक्षा एसीपी, आर सी पांडेय कहते हैं कि लिव-इन रिश्तों में रह रही महिला पर अत्याचार का हक किसी को नहीं है। हमारे पास जब ऐसे मामले आते हैं तो हम दोनों पक्षों को सुनकर हर पहलू ध्यान में रखकर प्रक्रिया आगे बढ़ाते हैं। पति-पत्नी मामलों की तरह यहां भी हम कई बार जोड़ों को काउंसिलिंग करते हैं ताकि यदि मामला आपसी सूझबूझ से सुलझ सके तो बेहतर है। कई बार आपसी विवाद बढ़कर आपराधिक घटना में तब्दील हो जाता है तो सख्त कार्रवाई जरूरी है। लेकिन दोनों पक्षों को सुनना समझना भी अनिवार्य है।
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