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नल्हड़ मेडिकल कॉलेज में समय पर इलाज न मिलने से मरीज की मौत

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नूंह। नल्हड़ मेडिकल कॉलेज में समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण गांव झरपुड़ी निवासी पप्पू की मौत होने का मामला सामने आया है। परिजनों ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है। परिजनों का आरोप है कि अगर उनके मरीज को समय पर उपचार मिल जाता तो उसकी जान बच सकती थी।
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झारपुड़ी निवासी जफरू सरपंच और मृतक का बेटा तालब ने बताया कि पप्पू को 23 अप्रैल को मामूली बुखार हुआ था। इसके बाद उन्होंने नल्हड़ मेडिकल कॉलेज में कोरोना की जांच कराई। इसके बाद सोमवार को मेडिकल कॉलेज से पास फोन आया कि उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उनकी तबियत के बारे में जानकारी भी ली। तब उनकी तबियत ज्यादा खराब नहीं थी तो उन्हें होम आइसोलेट कर दिया गया। लेकिन, बुधवार को उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें पुन्हाना व पिनगवां के प्राइवेट अस्पतालों में लेकर गए, लेकिन वहां पर भर्ती करने से मना कर दिया। फिर वह मांडीखेड़ा के जिला नागरिक अस्पताल में गए, वहां से उनको नल्हड़ मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया गया। मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकों ने कुछ समय के लिए ऑक्सीजन लगाकर बोला कि मरीज कोरोना पॉजिटिव है। पांच दिन की दवाई ले जाओ, यहां पर कोई बेड, ऑक्सीजन सिलिंडर और वेंटिलेटर नहीं है। इसके बाद पप्पू को वहां से बाहर कर दिया गया। उनकी तबियत ज्यादा खराब होती जा रही थी और परिजन बुधवार रात को करीब 12 बजे डॉक्टरों से भर्ती करने की गुहार लगाते रहे। लेकिन, किसी का दिल नहीं पसीजा। इसके बाद एक डॉक्टर ने करीब 3:30 बजे मरीज को ऑक्सीजन लगाई, जिससे कुछ समय के लिए उनको राहत मिली। इसके बाद ऑक्सीजन खत्म हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि अब ले जाओ, यहां पर कुछ नहीं है। थोड़ी देर बाद मरीज ने दम तोड़ दिया। मृतक के बेटे तालब ने कहा कि अगर उनके पिता का सही तरह से उपचार किया जाता तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। लेकिन, डॉक्टरों की लापरवाही के कारण उनके पिता की जान चली गई। उन्होंने उपायुक्त से मांग की है कि इस मामले में उचित कार्रवाई की जाए। वहीं, इस बारे में मेडिकल कॉलेज की निदेशक डॉ. संगीता ने कहा कि मामले की जानकारी ली जाएगी। अगर इस तरह की लापरवाही हुई है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इससे पहले भी हो चुकी है मौत
जिले में इसी तरह लापरवाही के कारण नगीना के एक व्यक्ति की भी मौत हो गई थी। परिजनों ने सीधे तौर पर जिला नागरिक अस्पताल मांडीखेड़ा प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया था।
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