जेवर से 6 किलोमीटर दूर यमुना के खादर स्थित गोविंद गढ़ गांव में पद्म श्री के लिए चयनित होने की खबर पर घर में मौजूद उनके पिता अमरपाल सिंह, मां निर्दोष, भाई सचिन समेत पूरे परिवार में हर्ष का माहौल था। परिजन और ग्रामीण एक-दूसरे का मुंह मीठा करा रहे थे। वहीं, प्रवीण के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ था।
प्रवीण के पिता अमरपाल सिंह ने बताया कि बचपन से वह अपने मित्रों और सहपाठियों के साथ मिलकर वॉलीबॉल खेलते थे। उनकी टीम आसपास के गांवों में भी खेलने जाती थी। प्रवीण गांव की टीम में थे वह ऊंची छलांग लगाकर वॉलीबाल का तेज शॉट लगाता, एक माह बाद से उनके बेटे के एक पैर में दिक्कत दिखने लगी थी। प्रवीण की मां निर्दोष देवी ने बताया कि बड़े होने के बाद प्रवीण घर में कूदता-फांदता रहता था। सातवीं कक्षा के बाद उछलकर घर की छत को भी छू लेता था। उन्होंने बताया कि बचपन में ज्यादा कूद फांद करने पर वह खूब डांटती थीं।
प्रवीण ने बताया कि गांव में न तो खेल की सुविधा थी और न खेल का मैदान। कक्षा 9 के बाद प्रवीण स्कूल की ओर से ऊंची कूद और लंबी कूद स्पर्धा में हिस्सा लेने लगा था। तब वह यमुना किनारे रेत में गड्डे बनाकर अभ्यास करता था। ऐसे में कई बार चोट भी लग जाती थी।
कोच डॉ. सत्यपाल ने निखारी प्रतिभा
गाजियाबाद के एक खेल आयोजन में प्रवीण की मुलाकात कोच डॉ. सत्यपाल से हुई थी। उनके कहने पर पैरों के बल ही प्रवीण ने करीब 1.8 मीटर छलांग लगाई थी। इसे देखकर डॉ. सत्यपाल ने उसे प्रशिक्षण देने का फैसला कर लिया था। कोच ने उसे दिल्ली बुलाया और अपने कोटला स्थित फ्लैट की चाभी दे दी। प्रवीण वर्ष 2018 से लगातार दिल्ली में रहकर ही प्रशिक्षण ले रहे थे। केवल छुट्टियों में ही घर आते थे।
दिव्यांग होने पर मिले ताने लेकिन अपनी प्रतिभा के बल छू लिया आसमान
प्रवीण को कई स्थानों पर दिव्यांग होने के ताने मिले लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर ऐसा जवाब दिया कि फिकरे कसने वाले अब उनसे मिलने पर तारीफों के पुल बांधते रहते हैं। शुरूआत में उन्हें कई बार प्रतियोगिता में सामान्य बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती थी लेकिन उन्होंने सामान्य बच्चों को पछाड़कर कई बार पदक जीते और आज वह इस मुकाम पर पहुंचे हैं।
स्विट्जरलैंड में जब लगा था तैयारियों को धक्का लेकिन नहीं मानी हार
प्रवीण कुमार बताते हैं कि जब वर्ष 2018 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लेने पहुंचे तो उन्हें टी-42 वर्ग के बजाए उन्हें टी-44 वर्ग में डाल दिया गया। यह सबसे कठिनतम कैटगरी होती है। शुरूआत में उनको इसका धक्का लगा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहतन से इस प्रतियोगिता में भी जीत हासिल की। इसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।