कॉल सेंटर में कॉल करने के 24 घंटे बाद तक एंबुलेंस नहीं आई। मजबूरी में सोसाइटी के निवासियों ने पीपीई किट खरीदकर पीड़ित के बेटे को दी। किट पहनकर बेटा गाड़ी चलाकर दिल्ली के अस्पताल में पिता को भर्ती करा पाया। हद तो तब हो गई, जब अगले दिन कॉल सेंटर कर्मचारी ने फोन कर पूछा कि आपको सेवाएं कैसी लगीं।
होम्स-121 निवासी दिनेश सिंह ने बताया कि सोसाइटी में कोरोना पॉजिटिव होम आइसोलेशन में थे। बृहस्पतिवार को उनकी तबीयत बिगड़ गई। ऑक्सीजन का स्तर 88 तक पहुंच गया। जानकारी होने पर 108 कॉल सेंटर पर फोन करके एंबुलेंस भेजने को कहा, उन्होंने कॉल आगे ट्रांसफर की।
वहां मरीज का पूरा विवरण लिया गया और कहा गया कि अगले 30 से 35 मिनट में एंबुलेंस पहुंच रही है। एंबुलेंस नहीं आने पर दोबारा फोन किया गया तो फिर से पूरी प्रक्रिया दोहराई गई, लेकिन इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ। ऐसा करते-करते शाम के 7:30 बज गए। कॉल सेंटर पर भी फोन किया गया, लेकिन कुछ प्रतिक्रिया नहीं मिली।
इसके बाद प्राइवेट एंबुलेंस से भी मरीज को लेकर जाने का निवेदन किया गया, लेकिन सब ने आने से मना कर दिया। नोएडा के हर अस्पताल में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। मजबूरी में एक पीपीई किट खरीदकर मरीज के बेटे को दी गई। बेटा किट पहनकर पिता को गाड़ी में बैठाकर दिल्ली स्थित होली फैमिली अस्पताल लेकर गया। वहां पर मरीज को भर्ती किया गया।
दिनेश सिंह ने बताया कि एंबुलेंस के लिए सोसाइटी के 10 से अधिक लोगों ने फोन किया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हद तो तब हो गई, जब अगले दिन कॉल सेंटर से फोन आया और पूछा गया कि एंबुलेंस की सेवाएं कैसी लगी। इससे ज्यादा लापरवाही और क्या हो सकती है। सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं रह सकते हैं।
अगर कोविड वार रूम में मरीज को बेड अलॉट किया गया है तो एंबुलेंस जरूर जाएगी। एंबुलेंस संचालकों की प्राथमिकता होती है कि गंभीर मरीजों को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं।
- दीपक सिंह, जिला समन्वयक, एंबुलेंस