अध्यक्ष ने मीडिया प्रतिनिधियों को विधानसभा परिसर का भ्रमण कराया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने बुधवार को मीडिया प्रतिनिधियों को विधानसभा परिसर का भ्रमण कराया। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यहां फांसी घर जैसा कोई स्थान कभी नहीं रहा है। न तो कोई ऐतिहासिक प्रमाण है, न ही कोई अभिलेखीय आधार।
इमारत की कहानी 11 दिसंबर 1911 से शुरू होती है। जब किंग जॉर्ज पंचम के दिल्ली दरबार में तत्कालीन वायसराय ने भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की ऐतिहासिक घोषणा की थी। इसके बाद नई राजधानी में सचिवालय और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए भवन निर्माण की आवश्यकता पड़ी। वर्ष 1912 में इस विधानसभा कक्ष का निर्माण प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार ई. मोंटेग्यू थॉमस के डिजाइन में आरंभ हुआ और मात्र आठ महीनों में फकीर चंद ठेकेदार की देखरेख में कार्य पूर्ण हुआ। यह भवन पहले इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल और 1919 के बाद सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली का कार्यस्थल रहा। इसके मूल स्थापत्य चित्र आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार में संरक्षित हैं। अध्यक्ष कक्ष के दोनों ओर बराबर दूरी पर दो एक जैसे लिफ्ट शाफ्ट स्थित हैं जो ब्रिटिश काल में सदस्यों तक टिफिन पहुंचाने के लिए बनाए गए थे। इन सेवा कक्षों को ही अब गलत तरीके से फांसीघर कहकर प्रचारित किया जा रहा है जबकि इसका कोई ऐतिहासिक या स्थापत्य प्रमाण मौजूद नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह भवन सिर्फ 115 वर्ष पुराना स्मारक नहीं है बल्कि यह भारत की राजनीतिक यात्रा का साक्षी है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि जनता के करोड़ों रुपये इस भवन को एक काल्पनिक फांसी घर के रूप में प्रस्तुत करने में व्यर्थ खर्च कर दिए गए जो ऐतिहासिक दृष्टि से भ्रामक और जनता के धन का दुरुपयोग है।