यमुनानगर। कपालमोचन देश का एकमात्र ऐसा मेला है जिसमें न तो कोई ढाबा है और न ही कोई रेस्टोरेंट। पांच दिन के लिए जो अस्थायी दुकानें लगती हैं, उनमें भी किसी में भोजन की व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद मेले में आने वाला कोई भी श्रद्धालु भूखा नहीं रहता, वह भी एक या दो दिन नहीं बल्कि पूरे पांच दिन।
मेले में इतने भंडारे लगते हैं कि यहां पर कोई व्यक्ति ढाबा या रेस्टोरेंट खोलने के बारे में सोच भी नहीं सकता। किसी ने एक दो प्रयास किया तो उसके दरवाजे तक कोई भोजन करने गया ही नहीं। 122 एकड़ में लगे कपालमोचन मेला में अभी तक 70 से ज्यादा भंडारे चल रहे हैं। लंगर लगाने के लिए पंजाब समेत अन्य जगहों से संगत के आने का सिलसिला जारी है। जब मेला अपने समापन की तरफ पहुंचेगा तो कपालमोचन मेला परिसर में लगने वाले लंगर की संख्या 100 को पार कर जाएगी।
यहां एक भी धर्मशाला या मंदिर ऐसा नहीं है जिसमें लंगर न चल रहा हो। इसके अलावा खेतों में टैंट लगाकर लंगर बरताने की व्यवस्था अलग से है। इसलिए कुछ कदम चलते ही लंगर मिलेगा।
लंगर भी कोई ऐसे वैसे नहीं। इनमें श्रद्धालुओं के लिए कढ़ी-चावल, दाल चावल, पूड़ी, मक्की की रोटी, सरसों का साग, पकौड़े, ब्रेड, जलेबी, बर्फी, हलवा, लड्डू तक श्रद्धालुओं को परोसे जा रहे हैं। इतना ही नहीं मेला से लगते कई गांव तो ऐसे हैं जहां से काफी लोग भी दोपहर व रात के समय मेला में लगे लंगर में ही भोजन करते हैं। संवाद
कपालमोचन में ही रात को स्नान करने की परंपरा
पूरे देश में कपालमोचन ही ऐसा मेला है जिसमें आधी रात को 12 बजे स्नान करने की परंपरा है। वैसे तो देशभर के लगभग सभी राज्यों में मेलों का आयोजन होता है। परंतु इनमें एक भी ऐसा नहीं है जिसमें रात को स्नान होता हो। पांच दिवसीय मेला में कार्तिक पूर्णिमा की रात 12 बजे श्रद्धालु कपालमोचन, ऋणमोचन व सूरजकुंड सरोवरों के पवित्र जल में स्नान करते हैं। रात को चाहे सर्दी कितनी ही ज्यादा क्यों न हो लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था के आगे ठंड भी नतमस्तक हो जाती है। इस बार मेला में कार्तिक पूर्णिमा का स्नान चार नवंबर की रात 12 बजे होगा।
लंगर में प्रसाद ग्रहण करते श्रद्धालु। संवाद