मैनपुरी। मैनपुरी में जन्मे साहित्यकार कमलेश्वर ने जिले को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने हिंदी साहित्य पर कथा, उपन्यास लिखने के साथ ही कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिले को पहचान दिलाने वाले साहित्यकार की पहचान धीरे-धीरे मैनपुरी में खो गई। शहर में बना उनका पैतृक मकान उनके नाम नहीं रहा। उनकी याद में शहर में हिंदी भवन बनाने का निर्णय लिया गया था लेकिन यह योजना भी पूरी नहीं हो सकी है। चिंता की बात तो यह है कि जिले के साहित्यकार भी धीरे-धीरे साहित्य में मैनपुरी को पहचान दिलाने वाले उस महान व्यक्तित्व को भूलते जा रहे हैं।
साहित्यकार कमलेश्वर का जन्म छह जनवरी 1932 को शहर के मोहल्ला कटरा में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका बचपन परेशानियों में बीता। पिता को बचपन में ही खो चुके कमलेश्वर मां सहारा बनीं उन्होंने सारे संस्कार और शिक्षा मां से ही ग्रहण किए। प्रारंभिक शिक्षा मैनपुरी में पूरी करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए प्रयागराज गए। प्रयागराज में पढ़ाई के साथ ही जनक्रांति अखबार में काम भी किया। प्रयागराज तत्कालीन इलाहाबाद से ही साहित्यिक संस्कार बढ़ने पर उनकी साहित्यिक यात्रा प्रारंभ हुई ।
विज्ञापन
कथाकार के रूप में उनकी यात्रा कस्बे के कहानीकार से शुरू हुई। पहली कहानी कामरेड के बाद 1957 में प्रकाशित कहानी राजा निरबंसिया से उनको चर्चा मिली। मैनपुरी के परिवेश पर लिखी गई इस कहानी ने उनको स्थापित कहानीकारों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्होंने 300 से अधिक कहानियां लिखीं। 27 जनवरी 2007 को साहित्यकार कमलेश्वर ने इस लोक से विदा हो गए।
वर्ष 2001 में अंतिम बार आए थे मैनपुरी : साहित्यकार कमलेश्वर वर्ष 2001 में अंंतिम बार मोहल्ला कटरा स्थित अपना मकान बेचने के लिए मैनपुरी आए थे। गुपचुप तरीके से मकान का बैनामा कर दिया। जानकारी होने पर जिले के साहित्यकार शिवजी श्रीवास्तव के साथ दिल्ली गए। यहां उसी मकान को दोबारा खरीदकर हिंदी भवन बनाने का सपना देखा। लेकिन मकान मालिक द्वारा मकान नहीं बेचने के कारण जिले के साहित्यकारों का यह सपना पूरा नहीं हो सका।