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Noida News: बेटी बचाओं का संदेश भी दे रहे कावड़िये

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बेटी बचाओं का संदेश भी दे रहे कावड़िये
भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना हैं कि एक बेटी सबको दे, ताकि हर कोई बेटियों को सम्मान की निगाहों से देखे
संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। मनोकामनाओं और सामाजिक संदेशों के साथ कांवड़िये अपने गंतव्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। वहीं, तीन दोस्त बेटी बचाओ संदेश के साथ मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि बेटियां मान नहीं सम्मान हैं। भगवान शिव से प्रार्थना है कि हर घर में एक बेटी जरूर होनी चाहिए।
बुधवार को शनि देव मंदिर पर आयोजित शिविर में तीनों दोस्तों ने विश्राम किया। उन्होंने बताया कि वह हरिद्वार से जल लेकर फरीदाबाद जा रहे हैं। जतिन, दलीप और विवेक दो पालने भी साथ लेकर चल रहे हैं। दोनों पालनों में बेटी स्वरूप गुड़िया रखी हैं। पालने पर लिखा हैं कि हर घर में एक बेटी होना जरूरी है ताकि कोई दूसरों की बेटियों का सम्मान करे।
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वहीं दूसरे स्लोगन में लिखा है बेटी तू दुर्गा बन, काली बन, झांसी की रानी बन लेकिन लव जिहाद का शिकार मत बन। कांवड़िये जतिन ने बताया कि वह एक अस्पताल में काम करते हैं जहां गत वर्ष एक महिला की डिलीवरी हुई और उसने बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्म के बाद परिजन अफसोस करने लगे। उन्होंने कहा कि आज के दौर में भी लोग बेटियों को बेटों से अलग समझते हैं। ऐसे लोगों को वह संदेश देना चाहते हैं कि अगर बेटियां नही होंगी तो वह कन्या पूजन कैसे करेंगे। अपने बेटों के लिए बहुएं कहां से लाएंगे।
बेटी और बेटे में भेद नहीं करें लोग
कांवड़ यात्रा में बेटी बचाओ का संदेश देने वाले तीनों दोस्तों ने कहा कि भगवान की भक्ति करना अच्छी बात हैं, लेकिन हमें समाज के लिए भी कुछ संदेश देने चाहिए। लोगों को बेटियों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से यह संदेश दे रहे हैं। शिवरात्रि पर भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। भगवान से प्रार्थना हैं कि वह लोगों को बुद्धि दें कि वह बेटे और बेटी में भेद न करें।
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बाल कांवड़िये बढ़ा रहे उत्साह
जैसे-जैसे शिवरात्रि नजदीक आ रही है कांवड़ियों का हुजूम बढ़ता जा रहा है। इनके बीच बाल कांवड़िये बोल-बम, बोल-बम बोलते बड़ों के साथ कदम से कदम मिला रहे हैं। बिना थकान और शिकन के ऐसे कांवड़िये बड़ों को भी उत्साहित कर रहे हैं। शनिदेव मंदिर पर आयोजित शिविर में ठहरे बाल कांवड़िया 12 साल के चिराग सैनी ने बताया कि वह अपने चाचा अनिल सैनी के साथ पहली बार कांवड़ लेने के लिए निकले हैं। चिराग कहते हैं कि इस यात्रा में उनको थकान तो हुईं लेकिन अच्छा लगा। वहीं, बल्लूराम 10 साल की उम्र में पहली बार कांवड़ उठाई है। अब कम दूरी वाले कांवड़ियों की संख्या बढ़ने लगी है।
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