नई दिल्ली। अदालत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक बर्खास्त प्रोफेसर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें वास्तुकला विभाग के दो संकाय सदस्यों पर प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया गया था। याची ने कथित तौर पर गलत तरीके से बर्खास्तगी और जालसाजी के आरोप में मुकदमा दर्ज करने का निर्देश देने का आग्रह किया था।
अदालत ने कहा कि मामला सेवा विवाद से संबंधित है और ऐसा प्रतीत होता है कि ‘दबाव की रणनीति’ के रूप में दायर किया गया है। मोहम्मद अरशद मलिक को 2017 में वास्तुकला विभाग में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था। अगले साल कथित तौर पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
उसने एफआईआर के लिए 2018 में याचिका दायर की थी। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने याचिका 2019 में खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ मलिक ने सत्र अदालत में याचिका दायर की थी।
साकेत जिला अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुज अग्रवाल ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा, ‘मेरे विचार में किसी भी सबूत के संग्रह के लिए पुलिस द्वारा किसी जांच की आवश्यकता नहीं है। मामला सेवा विवाद से संबंधित है और ऐसा प्रतीत होता है कि दबाव की रणनीति के रूप में दायर किया गया है।’
न्यायाधीश ने कहा, मैंने पाया है कि मजिस्ट्रेट ने विवेकाधीन शक्ति का सही प्रयोग किया है। इस अदालत को 20 जुलाई, 2019 के आदेश में दखल देने का कोई कारण नहीं दिखता है।
मलिक के अनुसार, विभाग के प्रमुख और जामिया के वास्तुकला विभाग के डीन ने कथित तौर पर मिलीभगत कर विश्वासघात और जालसाजी का अपराध किया। मलिक ने जामिया नगर पुलिस थाने के प्रभारी, सहायक पुलिस आयुक्त और पुलिस उपायुक्त पर 2018 में उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए अदालत की शरण ली थी।