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Noida News: गुजारा भत्ता मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश

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- अदालत के आदेश की कॉपी दिल्ली जीडीसीएल अकादमी को भी भेजी जाएगी
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। परिवारिक अदालतों में बढ़ते बोझ और भावनात्मक रूप से जटिल विवादों के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) के मामलों में संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है। न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की एकलपीठ ने एक अंतरिम गुजारा भत्ता आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया और कहा कि ऐसे आदेशों में विचारों का न्यायसंगत अनुप्रयोग होना चाहिए, न कि यांत्रिक अनुमानों पर आधारित।
कोर्ट ने कहा कि परिवारिक अदालतों के समक्ष मामलों का बोझ अत्यधिक है और जजों को प्रतिदिन कई जटिल व भावनात्मक विवादों की सुनवाई करनी पड़ती है। न्यायमूर्ति ने अपने फैसले में कहा कि त्वरितता (एक्सपीडिशन) का मतलब तर्क की कीमत पर नहीं होना चाहिए। इस मामले की पृष्ठभूमि में एक पारिवारिक विवाद शामिल है, जहां पक्षकारों द्वारा आय और संपत्ति के बारे में दाखिल हलफनामे अपूर्ण या अस्पष्ट थे। कोर्ट ने अंतरिम चरण में विस्तृत वित्तीय जांच संभव न होने के बावजूद आदेशों में तर्कसंगतता और स्पष्टता का अभाव न होने पर जोर दिया। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि गुजारा भत्ता के आदेश केवल वित्तीय गणना नहीं हैं, बल्कि यह एक न्यायिक जिम्मेदारी है जो लोगों की गरिमा, जीविका और स्थिरता को प्रभावित करती है। इसलिए, ऐसे आदेश कानून की सटीकता के साथ-साथ याचिकाओं के पीछे छिपी मानवीय स्थितियों की समझ भी दर्शाएं।
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जिला अदालतों को भेजी गई फैसले की प्रति
इस फैसले को लागू करने के लिए कोर्ट ने निर्देश जारी किए हैं कि इसकी प्रति दिल्ली के सभी प्रधान जिला जजों और परिवारिक अदालतों को भेजी जाए। साथ ही, दिल्ली ज्यूडिशियल एकेडमी को इसे प्रशिक्षण मॉड्यूल में शामिल करने का आदेश दिया गया है, ताकि न्यायिक अधिकारी इन सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करें।
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