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Noida News: सच्चे प्रेम में अपने शरीर के सारे सुख और स्वार्थ विस्मृत हो जाते हैं

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प्रेम की गति अद्भुत होती है और सच्चे प्रेम की तो अत्यंत अद्भुत। उसमें अपने शरीर के सारे सुख और स्वार्थ विस्मृत हो जाते हैं। प्रियतम को जो-जो बातें रुचती-सुहाती हैं वही बातें प्रेमी को भी भाती हैं। लौकिक प्रेम में जहां प्रेमी अपना सुख चाहता है और प्रेमिका अपना रस। वहां प्रेम कभी स्थायी नहीं हो सकता।
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उक्त बातें कथा व्यास वृंदावन गोरीलाल कुंज श्रीधाम के महंत स्वामी किशोरदास देव ने कहीं। वह बृहस्पतिवार को श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दार अंधविद्यालय दुर्गाकुंड में संकटमोचन संकीर्तन मंडल की ओर से चल रही सात दिवसीय भक्तमाल कथा के चौथे दिन प्रवचन कर रहे थे। महंत स्वामी किशोरदास देव ने बांके बिहारी के परम भक्त स्वामी हरिदास महाराज की भक्तवत्सलता की कथा सुनाते हुए कहा कि हरिदास देव को रसिक चक्र चूड़ामणि उपाधि प्राप्त हुई। वे एक भक्त कवि, संगीतकार, और सखी संप्रदाय (हरिदासी संप्रदाय) के प्रवर्तक थे। उन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है और वे वृंदावन में रहते थे। रसिक चक्र चूड़ामणि का अर्थ है जो ईश्वर के प्रेमपूर्ण रूप का आनंद लेता है। प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन आरती शिवकुमार एवं अखिलेश खेमका ने किया। इस अवसर विजय कुमार मिश्र,नीरज दुबे, बलदाऊ पाठक ज्ञानु, विनोद पाल, जितेंद्र खनेजा उपस्थित थे।
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